रविवार, 17 जुलाई 2011

अपराधों की राजधानी-मुज़फ्फरनगर [उत्तर प्रदेश]

        अपराधों की राजधानी-मुज़फ्फरनगर [उत्तर प्रदेश]


''किस किस को बचायेंगे मेरे प्यार के आंसू,
हर शख्स यहाँ आग लगाने पे तुला है.''
डॉ.जे.पी.गोयल के ये उद्गार आज के मुज़फ्फरनगर पर पूरी तरह से खरी उतरती हैं विश्व के मानचित्र पर अपराधों से थर्राया ये जिला आज अपराध की हर किस्म से त्रस्त है और हालत इस हद तक बेकाबू हो चुके हैं की यहाँ से पलायन बहुत ऊँचे स्तर तक पहुँच चुका है .जिले में सुरक्षा व्यवस्था नाम की कोई चीज़ नहीं है .समाचार पत्रों में आये दिन मुज़फ्फरनगर में निशदिन घटित होने वाले अपराध छाये हैं .कल १५ जुलाई के अमर उजाला के पृष्ठ २ पर ही इस सम्बन्ध में कहा गया-
''एक बार फिर पुराने ढर्रे पर आयी अपराध नगरी''
''१४ दिन में १२ क़त्ल और २३ लूट ''
आज ये हालत हैं की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं-
''सब  लुट गए अरमान मेरी जान में आके,
लोगों ने मुझे लूटा है मेहमान बनाके,
मिलते ही मुझे जिंदगी बीमार हो गयी,
चारागरों की हर दवा बेकार हो गयी ,
जीने की तमन्ना जगी शमशान में जाके.''
आज यही स्थिति है दिन प्रतिदिन बिगडती जा रही ये स्थिति देख पुलिस के भी हाथ पांव फूल चुके हैं वह भी इसी असमंजस में है की किस तरह इन अपराधियों की नाक में नकेल डाली जाये एक तरफ कोशिश करती हुई पुलिस की स्थति ये है की इतने वह एक अपराध को सुलझाने की कोशिश करती है इतने दूसरा घटित हो जाता है और फिर तीसरा और चौथा ,कहीं ये संख्या थमती नज़र नहीं आ रही .१ जुलाई को दिल्ली के एक परिवार की युवतियों से रेप के प्रयास की हाई प्रोफाइल घटना की गूँज दिल्ली तक पहुंची थी .इसके बाद प्रेमी हमजा और प्रेमिका ताहिरा को प्रेम के दुश्मनों ने मौत के घाट उतार दिया था .८६ लाख रूपए की लूट कर फरार मुस्तफा उर्फ़ कग्गा से हुई मुठभेड़ में सिपाही सचिन शहीद हो गया था . 
मुज़फ्फरनगर के मल्हुपुरा में दो युवकों में चल रही आपसी टेंशन ने मल्हुपुरा की फिजा में ज़हर घोल दिया फायरिंग, पथराव ,और आगजनी से भगदड़ मच गयी हमलावरों में बी टेक और एम्.बी.ई के छात्र भी शामिल थे दूसरी ओर गाँव परसोली में छेड़छाड़ के विरोध में जमकर बवाल हुआ हमलावरों ने पीड़ित परिवार पर अंधाधुंध गोलियां बरसाकर एक लड़की को मौत के घाट उतार दिया जबकि कई गंभीर रूप से घायल हो गए .आज का अमर उजाला बताता  है एक ओर ऑनर किलिंग की बात ''थाना ककरोली के गाँव चौरावाला की सोनिया की मृत्यु को उसके घर के लोग हार्ट अटैक का नाम  दे रहे थे ओर उसकी लाश का अंतिम संस्कार करने जा रहे थे किन्तु उन्होंने अचानक इरादा बदल दिया और शव को पत्थर से बांधकर गंगा में फैंककर फरार हो गए यहीं से इसके ऑनर किलिंग का शक हुआ और पुलिस ने शव गंगा से निकाल कर पोस्ट मार्टम के लिए भेज दिया और ये देख कर वास्तव में लगा की-
''पानी पे तैरती हुई ये लाश देखिये ,
और सोचिये डूबना कितना मुहाल है.''
आज ही मुज़फ्फरनगर जेल में चली गोली से एक बंदी घायल हो गया और जिला कारागार में गोली चलने से पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लग गया .अभी हाल में ही बेकाबू ट्रक ने उजाड़ दी चैयरमेन की हरी भरी'' बगिया ''-रविवार की शाम तक जिस परिवार में बेहद ख़ुशी थी सोमवार की सुबह उनके लिए काल बन कर आयी उनके पूरे परिवार को एक ट्रक ने मौत का झपट्टा मारा और इस तरह वर्तमान चेयरमेन गौरववीर का पूरा परिवार मौत के घाट चढ़ गया ये हादसा तो एक सूचना मात्र है और इसके लिए साजिश की आशंका भी की जा रही है किन्तु यहाँ रोज दुर्घटनाएं हो रही हैं और उनमे कितने ही लोग अपनी जान से हाथ धो रहे हैं .जिनमे से अधिकांश के लिए साजिश की ही आशंका की जा रही है और मन यही कहता है-
''ले चलो मुझको आमिर इन दहशतों के शहर से ,
कैसे दीवारों से देखूं खून यूँ रिसता हुआ .''
और तो और इस जनपद में अपने मुकदमों की पैरवी भी इतनी कठिन है की पैरोकारी पर जाने का मतलब है अपनी जान से हाथ धोना .इतिहास साक्षी है की या तो पैरवी करने जाने वाले लोग गोलियों का निशाना बन जाते हैं या फिर शहर से पलायन कर जाते हैं और किसी गुप्त स्थान की ओर चले जाते हैं .
मैं तो आजकल रोज के समाचार पत्रों में मुज़फ्फरनगर की इतनी घटनाएँ देख रही हूँ की एक बार को तो मन नहीं करता किउसे खोलूँ ओर पढूं .बस  अब तो यही कह सकते हैं -
''आज के दौर में और क्या चाहिए ,
साँस लेने के काबिल फिजां चाहिए.''
और हमें नहीं लगता की ऐसा मुज़फ्फर नगर में अभी कुछ समय होने के लिए कोई अवसर हैं.
              शालिनी कौशिक 

4 टिप्पणियाँ:

शिखा कौशिक ने कहा…

बिलकुल सच लिख रही हैं आप आज मुज़फ्फरनगर अपराधों का नगर बन चुका हैं .सार्थक लेखन .आभार

veerubhai ने कहा…

झूठी शान -ओ -शौकत के लिए मासूमों की जान लेने को मैं कैसे कह दूं -
आनर किलिंग .
अपने ही हाथों अपने खून का खून तुम कहते हो -
आनर किलिग़ -
मैं भी कह दूं ?
ये दारिद्र्य है सोच का -
कबीलाई प्रवृत्ति है -
यही सब करना है तो जा लौट जा -
प्रस्तर युग में कमसे कम -
इस २१वी शती को दाग तो न लगा .

मदन शर्मा ने कहा…

आपके पिछले आलेख से भी हमें बहुत सारी जानकारियां मिली थीं और इससे भी हम जरूर लाभान्वित होंगे ................
आपकी नजरिये से पूरी तरह सहमत |
बहुत अच्छी प्रस्तुति!

हरीश सिंह ने कहा…

आपकी नजरिये से पूरी तरह सहमत |
बहुत अच्छी प्रस्तुति!

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