शुक्रवार, 11 मार्च 2011

प्रेम क्या है? (what is Love?)


प्रेम क्या है?
एक छोटा सा प्रश्न लेकिन अनेक उत्तर. एक ऐसा प्रश्न जिसके लिए हर किसी के पास अपना एक अलग उत्तर है. जिस जिस से पूछा जाए वह इसके लिए कुछ अलग उत्तर दे देता है. सबकी अपनी परिभाषाएं हैं प्रेम को लेकर. बहुत बार बहुत सी विरोधाभाषी परिभाषाएं भी.
मैं सोच रहा हूँ कि क्या प्रेम वास्तव में ऐसा है कि जिसकी कोई नियत परिभाषा ही नहीं बन पायी है. क्या प्रेम सचमुच ही ऐसा है कि इसका स्वरुप देश-काल और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित होता रहता है? क्या प्रेम का अपना कोई स्वरुप, अपनी कोई पहचान नहीं है?
क्या वास्तव में लोगों की भावनाओं के अनुरूप रूप ग्रहण कर लेना ही प्रेम का स्वरुप है? क्या प्रेम व्यक्तिगत या वस्तुगत हो सकता है? जिसके नाम पर हर रोज़ इतनी घृणा फैलाई जा रही है, क्या वही प्रेम है? क्या प्रेम महज एक दैहिक अभिव्यक्ति से अधिक कुछ भी नहीं? क्या किसी विपरितलिंगी के प्रति मन में उठ रही भावनाएं ही प्रेम हैं?
कदापि नहीं !!!
यह जो कुछ भी है वह प्रेम नहीं हो सकता. वह प्रेम हो ही नहीं सकता कि जो लोगों की भावनाओं के अनुरूप रूप ले लेता हो. वह प्रेम कदापि नहीं हो सकता है जिसके मूल में ही घृणा पल रही हो. प्रेम तो स्वयं एक सम्पूर्ण भाव है. प्रेम किसी के चरित्र का हिस्सा नहीं वरन स्वयं में एक पूर्ण चरित्र है.
प्रेम तो कृष्ण है, वह कृष्ण जिसके पाश में बंधकर गोपियाँ-ग्वाले और गायें सब के सब चले आते हैं.
प्रेम तो राम है, वह राम जिसके पाश में कोल-किरात भील सभी बंधे हुए हैं.
प्रेम तो ईसा है, वह ईसा जो मरते समय भी अपने मारने वालों के लिए जीवनदान की प्रार्थना करता है.
प्रेम बुद्ध है, वह बुद्ध जिसकी सैकड़ों साल पुरानी प्रतिमा भी करुणा बरसाती सी लगती है.
प्रेम बस प्रेम है.
प्रेम पुष्प की वह सुगंध है, जो बिना किसी भेद के सबको आह्लादित कर दे. प्रेम की गति सरल रेखीय नहीं है. प्रेम का पथ वर्तुल है. वह अपनी परिधि में आने वाले हर जीव को अपनी सुगंध से भर देता है. प्रेम करने का नहीं, वरन होने का भाव है. प्रेम स्वयं में होता है. प्रेम किसी से नहीं होता है, वरन वह किसी में होता है और फिर जो भी उस प्रेम की परिधि में आता है उसे वह मिल जाता है, बिना किसी भेद के. प्रेम किसी भी प्रकार से व्यक्ति-केन्द्रित भाव नहीं है.
यह कहना कि "मैं सिर्फ तुमसे प्रेम करता/करती हूँ." इस से बड़ा कोई झूठ नहीं हो सकता है.
लेकिन फिर ऐसे में यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि आखिर वैयक्तिक रूप से अपने किसी निकटवर्ती साथी, सम्बन्धी, मित्र या किसी के भी प्रति मन में उठने वाली भावना क्या है?
वह निस्संदेह प्रेम नहीं हैं, वरन प्रेम से इतर भावनाएं हैं, जिन्हें प्रेम मान लिया जाता है. प्रेम को समझने से पहले हमें कुछ शब्दों के विभेद को भी समझ लेना होगा.
प्रेम, प्यार, मोह (मोहब्बत) और अनुराग (इश्क) परस्पर समानार्थी शब्द नहीं हैं, बल्कि इनके अपने अर्थ और अपनी मूल भावनाएं हैं.
प्रेम शक्ति चाहता है, (Prem seeks Power )
प्यार को अपनी अभिव्यक्ति के लिए काया चाहिए. ( Pyar seeks Body ).
मोह (मोहब्बत) माधुर्य चाहता है, (Moh seeks Maadhurya ).
अनुराग (इश्क) आकर्षण चाहता है. ( Anurag seeks Attraction ).
प्रेम शक्ति चाहता है. यह शक्ति शरीर की नहीं, मन की शक्ति है. एक कमजोर व्यक्ति सब कुछ तो कर सकता है. वह विश्व-विजयी हो सकता है, प्रकांड विद्वान् हो सकता है, परन्तु उसमे प्रेम नहीं हो सकता है.
प्रेम का मूल निर्मोह है. निर्मोह के धरातल पर ही प्रेम का बीज अंकुरित होता है. निर्मोह की शक्ति के बिना प्रेम की प्राप्ति नहीं हो सकती है. पुष्प अगाध और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है. वह प्रेम रुपी सुगंध बिना किसी भेद के फैलाता है, लेकिन कभी किसी के मोह में नहीं आता. कोई दिन-रात बैठकर पुष्प के सुगंध की चर्चा करता रहे, लेकिन फिर भी पुष्प उसके मोह में नहीं आता. वह उसके जाने के बाद भी उसी प्रकार सुगंध फैलाता रहता है. वह एक निश्छल बालक के लिए भी उतना ही सुगन्धित होता है, जितना कि किसी भी अन्य के लिए.
प्रेम प्राप्ति का माध्यम नहीं है. प्रेम बंधन भी नहीं है. प्रेम तो मुक्त करता है. प्रेम जब अंकुरित हो जाता है तब प्राणिमात्र के बीच भेद नहीं रह जाता.
किसी की माँ को गाली देने वाला, अपनी माँ से प्रेम नही कर सकता. किसी भी स्त्री का अपमान करने वाला, अपने परिवार की स्त्रियों से प्रेम नहीं कर सकता. किसी के बच्चे पर हाथ उठा रही माता को अपने पुत्र से मोह तो हो सकता है, लेकिन उसके मन में सहज प्रेम नहीं हो सकता.
प्रेम जब होता है, तब सिर्फ प्रेम ही होता है. प्रेम किसी से नहीं होता है, प्रेम किसी में होता है, ठीक वैसे ही जैसे कि पुष्प की सुगंध हमसे या आपसे नहीं है, वह पुष्प में है, जो सबके लिए है.
बस यही प्रेम है.

-अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद
(09266377199)

9 टिप्पणियाँ:

मंगल यादव ने कहा…

अच्छी रचना।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

प्रेम का नाम लिया और राम , कृष्ण , ईसा और बुद्ध का नाम लिया लेकिन पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब का नाम न लिया । इसे क्या कहा जाए ?

योगेन्द्र पाल ने कहा…

आज क्या प्रेम दिवस है? जिस ब्लॉग पर भी जा रहा हूँ प्रेम के राग अलापे जा रहे हैं,

सुन्दर लिखा है आपने

हरीश सिंह ने कहा…

anwar bhai, amit ji aap se dar rahe the isiliye nam nahi liye kahi aap naraz na ho jay.
yogendra ji 15 march tak yaha prem ki mahabharat chal rahi hai. aap bhi shamil ho jaiye....
amit ji achchhi rachna.

Amit Tiwari ने कहा…

@ मंगल जी धन्यवाद.
@ योगेन्द्र जी प्रेम अपनी चर्चा के लिए किसी दिन का मोहताज थोड़े न है. जब भाव उठे उसे लिख डालना चाहिए.
@ अनवर जी- पैगम्बर मोहम्मद साहब का नाम न लिया जाना किसी पूर्वाग्रह के कारण नहीं है. यद्यपि इसे लिखते हुए मैंने खुद भी एक बार सभी उद्धरणों को देते समय इस विषय में सोचा था, लेकिन ऐसा महज मेरी जानकारी की कमी के कारण हुआ है. मुझे पैगम्बर मोहम्मद साहब से जुडी हुई किसी भी घटना की जानकारी नहीं है. और मैं किसी भी तरह से अज्ञानता में कोई बात नहीं लिखना चाहता था. चर्चा प्रेम की थी, इसलिए उसके मूल में कहीं कोई बैर की बात हो जाए, ऐसा नहीं चाहता था मैं. मैं स्वीकारता हूँ कि मुझे मोहम्मद साहब से जुडी कोई जानकारी ना होने का कारण निस्संदेह हमारा आज का समाज ही है, लेकिन उस से भी बड़ा सत्य यही है कि मेरे मन में मोहम्मद साहब या कि इस्लाम को लेकर कोई पूर्वाग्रह नहीं है. यद्यपि किसी भी धर्म सम्प्रदाय को लेकर मैं किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं हूँ. ऐसा मेरे बहुत से लेखों में बहुत बार परिलक्षित भी होता रहेगा.
बहरहाल मैं आपसे यह निवेदन जरूर करना चाहूँगा कि यदि ऐसा कोई भी प्रसंग आप मुझे बताएं तो मैं जरूर उसे अपने लेख में जोड़कर इसे पूर्ण करना चाहूँगा. आपका अत्यंत आभार होगा.

@हरीश जी समर्थन के लिए आभार.

हरीश सिंह ने कहा…

अमित आपने जो जबाब दिया वह मेरी उम्मीद से अधिक उम्दा है. अपनी कमी को इस तरह स्वीकार करना ही बड़प्पन है. आप मेरी नजरों में बड़े हो गए. मेरी सोच जो इस परिवार के प्रति है. यह प्रेम उसका समर्थन है.

कुणाल वर्मा ने कहा…

प्रेम किसी स्वार्थ का मोहताज नहीँ,ये नि:स्वार्थ होता है
बहूत खूब। आभार

saty bolna paap hai ने कहा…

निःस्वार्थ प्रेम ही सच्चा प्रेम है. सुन्दर प्रस्तुति

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

यह एक दुखद सत्य है कि आज हरेक शहर में अज़ान की आवाज़ गूँज रही है और अज़ान के माध्यम से पैगम्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. का नाम भी लोग सुन रहे हैं लेकिन इसके बावजूद
ज़्यादातर लोग उनके सुधार कार्यों और उनकी कुर्बानियों के बारे में ठीक तरह नहीं जानते . पैगम्बर साहब स. ने लोगों के ज़ुल्म झेले और फिर भी उन्हें दुआ दी, उन्हें नेक राह दिखाई , उनसे ऐसा प्रेम किया कि न सिर्फ उनका जीवन बदल गया बल्कि दुनिया की सारी कौमों की जीवनधारा ही बदल गयी.
लोग इन सच्चाइयों को नहीं जानते , यह एक काबिले अफ़सोस बात है जबकि आज नेट के युग में कुछ भी जानना निहायत आसान है.
प्रोफ़ेसर रामाकृष्णा राव की पुस्तक इस अज्ञानता को दूर करने में लाजवाब भी है और संक्षिप्त होने के कारण इसे पढना भी आसान है .
हमारे आदरणीय गुरु मुहम्मद उम्र कैरानवी साहब के ब्लॉग पर यह सबके लिए सुलभ है.
अमित तिवारी जी ने बिना किसी लाग लपेट के सच्ची बात बता दी , इसके लिए वे धन्यवाद के हक़दार हैं.
हकीकत यह है कि अगर आज पैगम्बर साहब स. के बारे में जानकारी आम हो जाए तो बहुत सी गलतफहमियां दूर हो जाएँ .
इस वाकये ने मुझे इस बात की तरफ तवज्जो दिलाई है कि पैगम्बर साहब के जीवन की घटनाओं को सबके सामने लाया जाए ताकि लोग ज्ञान के आलोक में हकीक़त जान सकें और अपने जीवन को बेहतर बना सकें.
इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ( सल्‍ल. )
by Prof. Rama krishna Rao

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