शनिवार, 5 मार्च 2011

–डा श्याम गुप्त की कहानी..... इन्द्रधनुष


  प्रेम के रंग हज़ार...एक रंग यह भी...                          
                             इन्द्रधनुष                    
                       ( कहानी –डा श्याम गुप्त )                                              
       
सुमि, तुम !
       
के.जी. ! अहो भाग्य ,क्या तुमने आवाज़ दी ?
        
नहीं |
        
मैंने भी नहीं | फिर ?
        
हरि इच्छा , मैंने कहा |
       
वही खिलखिलाती हुई उन्मुक्त हंसी |
       
चलो , ’वक्त मेहरवान तो क्या करे इंसान कहाँ जाना है, सुमि ने पूछा |
       
मुम्बई, 'राशी' की कोंफ्रेंस है , और तुम ?
       
मुम्बई,पी जी परीक्षा लेने ; मेडिकल कालेज के गेस्ट हाउस में ठहरूंगी, और तुम |
       
मेरीन ड्राइव पर |
       
सागर तीरे !
       
नहीं भई, रेस्ट हाउस है ,चर्च गेट पर | चलो तुम्हारे साथ मेरीन ड्राइव पर घूमने का आनन्द लेंगे , पुरानी  यादें ताजा करेंगे |   रमेश कहाँ है ?          
       
दिल्ली, बड़ा सा नर्सिंग होम है,अच्छा चलता  है |
       
और फेमिली ?
       
बेटा एम् बी बी एस कर रहा है बेटी एम् सी ऐ  |  बस |
       
सुखी हो |
       
बहुत , अब तुम बताओ |
       
एक प्यारी सी हाउस मेनेजर पत्नी है, सुभी, सुभद्रा | बेटा बी टेक कर रहा है और बेटी  एम् बी ऐ |
        
और कविता ?
       
वो कौन थी, तीसरी तो कोई नहीं ?
       
तुम्हें याद है अभी तक वो पागलपन |
        
एक संग्रह छपा है , 'तेरे नाम '
        
मेरे नाम !
        "
नहीं तेरे नाम '
        
ओह !, मेरे नाम क्या है उसमें ?
        
सुबह देख लेना |
         
चलो सोजाओ ,सुबह बातें होंगीं ,फ्री टाइम में मेरीन ड्राइव  घूमना है, बहुत सी बातें करनीं हैं तुम्हारे साथ |
                 
                                                                  
                        राजधानी एक्सप्रेस तेजी से भागी जारही थी| सामने  बर्थ पर , सुमित्रा कम्बल
लपेट कर सोने के उपक्रम में थी और मेरी कल्पना यादों के पंख लगाकर बीस  वर्ष पहले के काल में विचरण करने लगी ।

                         **                                                        **                                                                                                                                   
                  
सुमित्रा कुलकर्णी , कर्नल कुलकर्णी की बेटी , चिकित्सा विद्यालय में मेरी सहपाठी , बेच पार्टनर, सीट पार्टनर  | सौम्य, सुन्दर ,साहसी ,निडर, तेज तर्रार, स्मार्ट, वाक्-पटु, सभी विषयों में पारंगत , खुले व सुलझे विचार वाली , वर्त्तमान में जीने वाली,  मेरी परम मित्र |  हमारी प्रथम मुलाक़ात कुछ यूं हुई |
                   
रात के लगभग ९ बजे ,लाइब्रेरी से बाहर आया तो सुमित्रा आगे आगे चली जारही थी , अकेली मैंने तेजी से उसके साथ आकर चलते चलते  पूछा, अरे, इतनी रात कहाँ से ? रास्ता सुनसान है ,तुम्हें डर नहीं लगेगा,क्या होस्टल छोड़ दूं ?
        
अजीव हैं , डर की क्या बात है |
        
ओ के , वाय, गुड नाईट , मैंने कहा | और चलदिया |
         
थैंक्स गाड, जल्दी पीछा छूटा , वह  बड़ बडाई |
        
सात कदम तो साथ चल ही लिए हैं , मैंने मुस्कुराते हुए मुडकर कहा |
       
क्या मतलब, वह झेंप  कर देखने लगी, तो मैंने पुनः' बाई' कहा और चल दिया
                       
फिजियो लेब में सुमित्रा झिझकते हुए  बोली, कृष्ण जी , ये मेंढ़क ज़रा 'पिथ' कर देंगे ?
                        
क्यों , मैंने पूछा ?
                        
ज़िंदा है अभी |
                        
तो क्या मरे को मारोगी , हाँ ये बात और है कि, “ सुन्दर सुन्दर को क्यों मारे , सुन सुन्दर मेंढक बेचारे | ", बगल की सीट पर बैठा सोमसुन्दरम हंसने लगा मैंने मेंढक हाथ में लेते हुए कहा, 'ब्यूटीफुल ' |
           
कौन, क्या ?
           
ऑफकोर्स , मेंढक , मैंने कहा | सुन्दर है न ?
          
आपके जैसा है | वह चिढ कर बोली |
           
मैं तुम्हें सुन्दर लगता हूँ ?  नहीं, मेढक , वह मुस्कुराकर बोली
           
इसकी टांगें कितनी सुन्दर हैं , मैं टालते हुए बोला , चीन में बड़ी लज़ीज़ तरह से खाई जातीं हैं ।

               ठीक है ,पैक  करके रख दूंगी , घर लेजाना  डिनर के लिए  |  तुम्हारी टांगें भी  सुन्दर हैं, लज़ीज़ होंगी  ,क्या उन्हें भी .....|   
           
क्या बकवास है ?
           
जो दिख रहा है वही कह रहा हूँ |
           
हूँ , वह पैरों की तरफ सलवार व जूते देखने लगी |
           
एक्स रे निगाहें हैं , आर पार देख लेतीं हैं , मैंने कहा |
           
क्या, वह हडबड़ा कर दुपट्टा सीने पर संभालते हुए ,एप्रन के बटन बंद करने लगी | मैं हंसने लगा तो ,सर पकड़ कर स्टूल पर बैठ गयी बोली, चुप करो, मेंढक लाओ, मुझे फेल नहीं होना है |
           
लो क़र्ज़  रहा, मैंने मेंढक लौटाते हुए कहा | वह चुपचाप अपना प्रक्टिकल करने लगी |
                                **                                       ** 
                    
डिसेक्सन हाल में    मैंने उससे पूछा , सुमित्रा जी, सियाटिक  नर्व को कहाँ से निकाला जाय , दिमाग से ही उतर गया है | ' है भी’.. .. उसने हाथ से चाकू लगभग छीन कर चुपचाप चीरा लगा कर फेसिया तक खोल दिया | बोली आगे  बढूँ  या....| अभी के लिए  बहुत है मैंने कहा --""आपने चिलमन ज़रा सरका दिया |   हमने जीने का सहारा पालिया ""
     
सुमित्रा चुपचाप अपने प्रेक्टिकल में लगी रही | बाहर आ कर बोली --
             
कृष्ण जी , उधार बराबर |
             '
और सूद'  मैंने कहा |
             
सूद , वह आश्चर्य से देखने लगी |
             
वणिक पुत्र जो ठहरा |
             
क्या सूद चाहिए ! 
             
चलो , दोस्ती करलें काफी पीते हैं , मैंने कहा तो वह सीने पर हाथ रख कर बोली , ओह !  ठीक है , मेरा तो नाम ही सुमित्रा है , दोस्ती करती है तो करती है , नहीं तो नहीं | निभाती भी है, मैने पूछा तो बोली”इट डिपेन्ड्स’।  केबिन में बैठकर मैंने उसका हाथ छुआ तो कहने लगी, उंगली पकड़ कर हाथ पकड़ना चाहते हैं , से तो तुम नहीं लगते आशाएं विष की पुड़ियाँ होतीं  हैं  ,बचे रहना |
       
सुमित्रा जी, मैंने कहा ,'मैं नारी तुम केवल श्रृद्धा हो' के साथ पुरुष सम्मान व नारी समानता दोनों का समान पक्षधर हूँ  वादा, जब तक तुम स्वयं कुछ नहीं कहोगी,कुछ
नहीं चाहूंगा | स्मार्ट, आत्म विश्वास से भरपूर ,मर्यादित नारी की छवि का मैं कायल हूं।

       ब्रेवो ,ब्रेवो !  वाह ! क्या बात है , पर ये भाषण तो मुझे देना चाहिए और ये  विचित्र से विचार  तो कहीं सुने-पढ़े से लगते  हैं, कृष्ण गोपाल ! वही तर्क,वही उक्तियाँ,  नारी -पुरुष समन्वय, शायरी |  क्या तुम के. जी. के नाम से 'नई आवाज़' में लिखते हो , तुम के जी हो ! उसकी तीब्र बुद्धि का कायल होकर मैं हतप्रभ रह गया और आँखों में आँखें डाल कर मुस्कुराया

           हंसी, एक उन्मुक्त हंसी | कमीज़ की कालर ऊपर उठाने वाले अंदाज़ में बोली, ये हम हैं, उड़ती चिड़िया के पर गिन लेते हैं | 'आई एम् इम्प्रेस्सेड मैं तो केजी की फ़ैन हूँ | कोई कविता हो जाय  गालों पर हथेली रखकर श्रोता वाले अंदाज़ में कोहनी मेज पर टिका कर  बैठ गयी | मैंने सुनाया--
       “” 
मैंने सपनों में देखी थी , इक मधुर सलोनी सी काया |".. …     
         “तुमको देखा मैंने पाया वह तो तुम ही थीं मधुर प्रिये |"     
    वाह ! , वह बोली , मैं सुखानुभूति से भरी  जारही हूँ ,कृष्ण | वह मेरा हाथ पकडे  बैठी रही |
               
तो दोस्ती पक्की , मैंने पूछा | तो कहने लगी, हूँ, अद्भुत तर्क,ज्ञान वैविध्य ,विना लाग लपेट बातें , मनको छूतीं हैं कृष्ण | और तुम्हें ...|
                
हाँ ,तुम्हारा आत्म विश्वास , सुलझे विचार,वेबाक बातें ,काव्यानुराग मुझे पसंद हैं सुमित्रा | वह अचानक सतर्क निगाहों से बोली, कहीं पहली नज़र में प्यार का मामला तो नहीं ! शायद , और तुम....मैंने पूछा | तो बोली पता नहीं.  नहीं  कर सकती, दोस्त ही रहूँगी , मज़बूर हूँ |
              
क्यों  मज़बूर  हो  भई |
              
दिल के हाथों , के जी जी | तुम पहले क्यों नहीं मिले , मैं वाग्दत्ता हूँ | रमेश को बहुत प्यार करती हूँ | शादी भी करूंगी |
               
ये रमेश कौन भाग्यवान है , मैंने पूछा तो बोली, मेरा पहला प्यार , हम एक दूसरे को बहुत चाहते हैं | दिल्ली में एम्,बी बी एस कर रहा है ,बहुत प्यारा इंसान है |    और मैं , जब मैंने पूछा तो ख्यालों से बाहर आती हुई बोली , तुम ..तुम हो , अप्रतिम , समझलो राधा के श्याम, और मैं तुम्हारी काव्यानुरागिनी | समझे , वह माथे से माथा टकराते हुए बोली |
               
अब मैं सुखानुभूति से पागल हुआ जारहा हूँ ,सुमि |
                
साथ छोड़कर भागोगे तो नहीं |
                नहीं,मैंने कहा “मैं यादों का मधुमास बनूं,जो प्रति पल तेरे साथ रहे”.. तो हंसने लगी ।

            क्या देवदास बन जाओगे ?  अरे नहीं , मैंने कहा, क्या मैं इतना बेवकूफ लगता हूँ ?  
            उसने कहा---
"मन से तो मितवा हम हो गए हैं तेरे ,
क्या ये काफी नहीं है तुम्हारे लिये।" --- मेरी कविता कैसी है महाकवि के.जी.?  
           मैंने कहा,' आखिर शिष्या किसकी बनी हो|', हम दोनों ही हंस पड़े , फिर अचानक चुप होगये |
                                                
                                                                                                                                     
             
कालेज डे मनाया जाना था| सुमित्रा तेज तेज चलते  हुए  आई , बोली , कृष्ण एक गीत बनाना है और तुम्हीं को गाना है | मैं नृत्य में अपना नाम दे रही हूँ |”  पर मुझे गाना कहाँ आता है , मैंने बताया ; किसी अच्छे गायक को लो न | नहीं नहीं,  ज्यादा लोगों को मुंह क्या लगाना, सब तुम्हारे जैसे सुलझे थोड़े ही होते हैं, वह सर हिलाकर बोली |
                
रिहर्शल  पर मैंने अपना पार्ट सुनाया -
"" तुम स्यामल घन , तुम चंचल मन
 तुम जीवन हो,  तुमसे जीवन ||                                 
तेरी प्रीति की रीति पै मितवा ,
 मैं गाऊँ मैं बलि बलि जाऊं ||""
          सुमित्रा ने सुनाया ----
""तेरे गीतों की सरगम पै मस्त मगन मैं नाचूं गाऊँ |
 
तेरी प्रीति की रीति पै मितवा, बनी मोहिनी मेंलहराऊं।“
              
सुमि ने कई बार गा गा कर बताया , डांस पहले स्लो रिदम पर फिर मध्यम पर अंत में द्रुत पर करूंगी, अंतरा इस तरह आदि  आदि | प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा  सुमि नाराज़ होते हुए बोली, बड़े खराब हो केजी, मनही मन मज़ाक बना रहे होगे | तुम तो बहुत अच्छा गा लेते हो, लगता था जैसे पंख लग गए हों , आज मैं बहुत बहुत बहुत  खुश हूँ |   पर "श्यामल घन " मेरा मजाक तो नहीं उड़ा  रहे, वह खुल कर हंसने लगी

                जी, श्याम सखी, द्रौपदी, अप्रतिम सुन्दरी , भी कोई बहुत गौर वर्णा  नहीं थी।                                                                                                                      
              
मुझे द्रौपदी कह रहे हो ?  
               मैंने कहा, नहीं भई, पर क्या द्रौपदी  पर क्या कोई शंका है तुम्हें ? तो हंसने लगी, बोली नहीं केजी जी, तुम्हारी बात तो बैसे ही सटीक बैठती है, मैं भी खुद को द्रौपदी कहती हूँ | मेरे भी पांच पति हैं |  
       मैंने उसे  आश्चर्य से देखा तो बोली -पति क्या है ? जो पत रखे , पतन से बचाए | शास्त्र बचन है --" यो, सख्यते , रक्ष्यते पतनात इति सः पति "
                            किस शास्त्र का है , मैंने पूछा | मेरे शास्त्र का , वह हंसकर बोली , मैंने भी हंसकर कहा , तब ठीक है , और पांच पति ?
                
जो पतन से बचाएं, शास्त्र व माता पिता के बचन, मेरी अपनी शिक्षा-दीक्षा, मेरा चरित्र व आचरण, रमेश, और .ररर ......तुम.... |   मैं चुप अवाक ... तो बोली, चकरा गए न ज्ञानी ध्यानी, फिर खिलखिलाकर भाग खडी हुई |
                          **                                                          **
               
धीरे धीरे जब चर्चाएँ गुनगुनाने लगीं तो एक दिन सुमि बोली, कोई चिंता नहीं के जी | कोई सफाई नहीं, भ्रम में जीने दो सभी को | लगभग सभी बड़ी बड़ी डिग्रियां लेकर अर्थ पुजारी बनने वाले हैं | प्रेम मित्रता, दर्शन, जीवन-मूल्य, परमार्थ सब व्यर्थ  हैं इनके लिए शायद मैं  कुछ मतलवी होरही हूँ  , तुम्हें यूज़  कर  रही हूँ | तुम्हारे साथ रहते कोई और तो लाइन मारकर बोर नहीं करेगा | मैंने प्रश्न वाचक निगाहों से देखा तो पूछ बैठी -
                 '
कोई भ्रम या अविश्वास तो नहीं लिए बैठे हो मन ही मन | ', कभी एसा लगा , मैंने पूछा ; उसके नहीं कहने पर मैंने कहा, तो सुनो ---" ये चहचहाते परिंदे, ये लहलहाते फूल, अपनी मुख़्तसर ज़िंदगी मैं इतने ग़मगीन नहीं तो होते कि खुद कुशी कर लें "
                
वाह !  मीना कुमारी पढ़ रहे हो  आजकल !   नहीं अभी तो सुमित्रा कुमारी पढ़ रहा हूँ,  मैंने हंसकर कहा तो बोली,  तो सुनो सुमि का लालची आत्म निवेदन --- 
 "" मैं हूँ लालच की मारी ,ये पल प्यार के,
 चुन के सारे के सारे ही संसार के ;                                                                                      
रखलूं आँचल में सारे ही संभाल के| ।“                       
 
चाहती हूं कोई नगमा  रूठे नहीं,
ज़िन्दगी का कोई पल भी छूटे नहीं”                                
             *                         *                          *
" प्यार का जो खिला है ये इन्द्रधनुष , 
जो है कायनात पै सारी छाया हुआ                     
प्यार के गहरे सागर मैं दो छोर पर 
डूब कर मेरे मन है समाया हुआ ।“
                             **                            **                                    **

                  सोचते सोचते जाने कब नींद आगई | सुबह किसी  के झिंझोड़ने पर मैं जागा-----
 क्या है सुभी सोने दो न
 मैं सुमि हूँ ,के जी , उठो  | क्या सपना देख रहे हो
               
मैं हड बड़ा कर उठा , ओह ! गुड मोर्निंग                 |
                     
                          
वेरी वेरी गुड है ये मोर्निंग , तुम्हारे साथ, कृष्ण | चलो आज मैं काफी लाई हूँ | सुमि खुले हुए बालों में फ्रेश होकर दोनों हाथों में कप पकडे हुई थी | हम दोनों ही हंस पड़े | मैंने उसे ध्यान से देखा | बीस वर्ष  बाद की सुमि | वही तेज तर्रार, आत्म विश्वास से भरी गहरी आँखें,मर्यादित पहनावा, गरिमा पूर्ण सौन्दर्य  | कनपटी पर कही कही  झांकते , समय की कहानी कहने को आतुर  रुपहले बाल |
                   
क्या देख रहे हो , सुमि आँखों में झांकते हुए मुस्कुराई | मै भी मुस्कुराया-------      
"दिल ढूढता है फिर वही
वो सुमि वो प्यारे दिन |
बैठे हैं तसब्बुर में जवां यादें लिये हुए “”
        
तुम तो वैसे ही हो योगी राज , वह हंसने लगी |
                                                                                       **                                                                          **                                          **
              
कार्यक्रमानुसार, हम लोग चौपाटी, मेरीन ड्राइव आदि घूमते रहे | चाट भेल पूरी आदि के वर्किंग लंच के बीच पुरानी यादें ताजा करते रहे | सुमि कहने लगी , सच कृष्ण , जब भी मैं उदास या थकी हुई परेशान होती हूँ तो चुपचाप झूले पर बैठ कर एकांत में कालिज व तुमसे जुडी हुई यादों में खोजाती हूँ जो मुझमें पुनः नवीनता का संचार करतीं हैं | सच है अच्छी यादें सशक्त टानिक होतीं हैं | क्या में विभक्त व्यक्तित्व हूँ ? और तुम तो अपने बारे मै कभी कहते ही नहीं |
            
नहीं सुमि, तुम अभक्त, अनंत,परम सुखी व्यक्तित्व हो , मैंने कहा , और मैं भी |
            
हर बात का उत्तर है तुम्हारे पास और तुरंत| उसने बांह  पकड़कर , सर कंधे से लगाते हुए कहा, चलो अब कुछ सुनादो | मैंने सुनाया --
  ""
प्रियतम प्रिय का मिलना जीवन, साँसों का चलना है जीवन |
    
मिलना और विछुना जीवन , जीवन हार भी जीत भी जीवन ||""
           
सुमि ने जोड़ दिया --
""प्यार है शाश्वत ,कब मरता है , रोम रोम में बसता है |
 
अजर अमर है वह अविनाशी ,मन मैं रच बस रहता है ""
            
ये तुमने कहाँ से याद किया , मैंने आश्चर्य से पूछा मैंने तुम्हारी सब किताबें पढीं हैं , वह बोली | कुछ देर हम चुप दोनों ही चुप रहे , फिर मैंने पूछा- कब जारही हो
        . चार बजे की  फ्लाईट से   आज,यहाँ का काम जल्दी ख़त्म होगया |, दो बज रहे हैं , मैंने  घड़ी देखते हुए कहा, एयर  पोर्ट छोड़ने चलूँ |
            हां ।

                    हम टेक्सी लेकर सुमि के गेस्ट हाउस होकर एयर पोर्ट पहुंचे | लाउंज के एक कोने में खड़े होकर अचानक सुमि बोली,  मुझे  किस करो कृष्ण |
             ' 
क्या कह रही हो, मैंने आश्चर्य से उसे देखा |'
               '
अब मैं ही कह रही हूँ, यही कहा था न तुमने |'  मैंने ओठों से उसके माथे को छुआ तो वह खिलखिला कर हंसती चली गयी | फिर बोली -
             
मैं क़र्ज़ मुक्त हुई कृष्ण, चैन से जा सकूंगी, कहीं भी | वह गहराई से आँखों में झांकती हुई बोली|
                    
और सूद, मैंने कहा |
                    
अगले जन्म मैं  |
                    
हम अगले जन्म में भी पक्के दोस्त रहेंगे, मैंने अनायास ही हंसते हुए कहा |
                    
नहीं , पति -पत्नी
                     '
व्हाट '  
             "
अगले जन्म की प्रतीक्षा  करो के जी " और वह तेजी से बोर्डिंग लाउंज में प्रवेश कर गयी |
                                                                                ---
इति ---
                                                 ---------------
डा श्याम गुप्त , के-३४८ आशियाना ,
                                                                           
लखनऊ -२२६०१२


                                                        



                      
    
              
                                                                                                                                                      

3 टिप्पणियाँ:

आलोकिता ने कहा…

Kafi lambi kahani thi thak gayi main padhte padhte

हरीश सिंह ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना, मजा आ रहा है. आज मूड थोडा ठीक नहीं है है. मन से पढने लायक है. आज इस पर कोई टिपण्णी नहीं.

saty bolna paap hai ने कहा…

सुन्दर रचना, aabhar

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