शनिवार, 12 मार्च 2011

अंधे रास्ते

वर्त्तमान समय के युवा वर्गोँ मेँ ऐसे अधिकांश युवा हैँ जिन्होँने अपनी मंजिल को भी अभी तक नहीँ पहचाना है।ये युवा बस एक अंधकारमय रास्ते पर चलते रहते हैँ।
हाल ही मेँ स्नातक करने वाले एक छात्र से मेरा मिलना हुआ।मैँने उनसे पूछा-आपने अपने छात्र जीवन का अधिकांश वक्त तो गुजार लिया।मैँ आपसे बस ये जानना चाहता हूँ कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है?आप क्या बनना चाहते हैँ? मुझे ये सुनकर बडा आश्चर्य हुआ जब उन्होनेँ कहा कि मैँने अब तक अपनी मंजिल नहीँ बनाई है।
मेरी ये आदत सायद कुछ खराब है कि मैँ जब भी किसी अध्ययनशील छात्र से मिलता हुँ तो ये जरुर पूछता हूँ कि आपका लक्ष्य क्या है? और मेरी बदकिस्मती..जवाब एक ही आता है जो मैँने बताया।बहुत कम ही ऐसे छात्रोँ से मिलना होता है जो अडिग होकर अपने लक्ष्य से परिचय करवाते हैँ।
उन छात्रोँ के बारे मेँ आपकी क्या राय है जो अंधे रास्ते पर बिना अपनी मंजिल पहचाने चलते जा रहे हैँ?हमेँ जरुर बताइए।
साक्ष्य:http://shabdshringaar.blogspot.com

7 टिप्पणियाँ:

निर्मला कपिला ने कहा…

जो बिना मंजिल की पहचान किये चलते रहते हैं वो कभी कामयाब नही होते। टूटे पत्ते की तरह जिधर हवा बहा ले गयी उधर ही चलते रहते है। दिशाहीन। आभार।

निर्मला कपिला ने कहा…

जो बिना मंजिल की पहचान किये चलते रहते हैं वो कभी कामयाब नही होते। टूटे पत्ते की तरह जिधर हवा बहा ले गयी उधर ही चलते रहते है। दिशाहीन। आभार।

kirti ki awaz ने कहा…

जीवन में लक्ष्य आवश्यक है, बिना लक्ष्य के जीवन बिना डोर की पतंग है.

saty bolna paap hai ने कहा…

लक्ष्य बिहीन जीवन बेकार, सत्य बचन

हरीश सिंह ने कहा…

लक्ष्य बिहीन जीवन बेकार सुन्दर प्रस्तुति के लिए शुभकामना.

मंगल यादव ने कहा…

आपके विचार से हम सहमत हैं। बिना लक्ष्य के जीना जिन्दगी भर रोना।

कुणाल वर्मा ने कहा…

आपसभी का बहुत बहुत धन्यवाद

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