शनिवार, 7 जनवरी 2012

अग्रज --प्रेमकाव्य.. अष्ठम सुमनान्जलि -सहोदर व सख्य-प्रेम..गीत २...डा श्याम गुप्त..........



              प्रेम  -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा
सकता; वह एक विहंगम भाव है  | प्रस्तुत है-- अष्टम सुमनान्जलि--सहोदर व सख्य-प्रेम ...इस खंड में ...अनुज. 
 
अग्रज,  भाई-बहन,  मेरा भैया,  सखा ,  दोस्त-दुश्मन एवं दाम्पत्य ...आदि सात  रचनाएँ प्रस्तुत की जायेंगी 
 
---प्रस्तुत है ...द्वितीय रचना....अग्रज ......
 
हे अग्रज ! तुमसे ही सीखा,
       अक्षर का विन्यास  ।
तुम ही तो थे बने प्रेरणा ,
        जागी अक्षर प्यास ||

तुम ही शिक्षक प्रथम हमारे,
         तुम ही प्रथम प्रभात |
भाव ज्योति की प्रथम किरन हो,
         ज्ञानी मन की आस ||

मातु पिता ईश से अन्यथा,
          प्रथम गुरू तुम तात |
हे अग्रज! तुम से ही सीखा,
          अक्षर का विन्यास ||  

देश कल गति की सीमा से ,
              कौन है बच पाया |
दूर रह रहे किन्तु मन बसा,
             याद  का सरमाया ||
मन की गति को दूर भला क्या,
             और भला क्या पास |
हे अग्रज ! तुम से ही सीखा,
             अक्षर का विन्यास ||

 
 

2 टिप्पणियाँ:

Sanju ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन पोस्ट है आपकी......
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद सम्जू....स्वागत है ....
---अच्छे विचार हैं....

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