शनिवार, 5 नवंबर 2011

वो




आंचती हुई काजल को
वो कैसे मुस्कुरा रही है |,

लुफ्त उठा जीवन का
मोहब्बत की झनकार में
अपनी धुन में मस्त उसकी
पायलियाँ गीत गा रही हैं |

केशो को सवारकर 
चुनरी ओढ़ वो घूँघट में
लज्जा से सरमा रही है |

साज सज्जा से हो तैयार
खुद को निहार आइने में
नजरे झुका और उठा रही है |

इंतज़ार में मेरे वो सजके
भग्न झरोखे में छिपकर
मेरा रास्ता ताक रही है |

- दीप्ति शर्मा 

5 टिप्पणियाँ:

शिखा कौशिक ने कहा…

bhartiy nari ka bahut sundar shabdon me chitran kiya hai .hardik shubhkamnayen

दीप्ति शर्मा ने कहा…

sukriya shikha ji

Dr. shyam gupta ने कहा…

....अच्छी कविता व भाव हैं...बधाई

---कविता के कला पक्ष में भी सुधार करें...
-पहला बन्द चार पन्क्तियो का है , वह भी तीन का होना चाहिये ..
-अन्तिम में ताक है- जो मुस्कुरा, गा, सरमा, उठा .से तुकबन्दी नहीं कर रहा ...

ana ने कहा…

achchhi prastuti par mai shyam ji ke bat se sahamat hoon

दीप्ति शर्मा ने कहा…

sukriya shyam ji yevam ana ji ,,, m sudhar ki kosis karugi

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