शनिवार, 9 जुलाई 2011

प्रेम काव्य-. षष्ठ सुमनान्जलि--रस श्रृंगार--संयोग( क्रमश:)- गीत-७ ----डा श्याम गुप्त

                    प्रेम -- किसी एक तुला द्वारा नहीं  तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक   विहंगम  भाव है | प्रस्तुत है ..षष्ठ  -सुमनान्जलि....रस श्रृंगार... इस सुमनांजलि में प्रेम के  श्रृंगारिक भाव  का वर्णन किया जायगा ...जो तीन खण्डों में ......(क)..संयोग श्रृंगार....(ख)..ऋतु-श्रृंगार  तथा (ग)..वियोग श्रृंगार ....में दर्शाया गया है...

1 टिप्पणियाँ:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

बहुत ही सार्थक कविता। बधाई।

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