गुरुवार, 14 जुलाई 2011

मनु सृजन!!!: दहेज़ कु-प्रथा !

तुमसे मैं कुछ कहना चाहता हूँ,

पर डरता हूँ ज़माने से,
मैं कुछ भी कर सकता हूँ.
पर डरता हूँ बताने से .
क्या पता कहीं तुम्हारा भाई , पहलवान हो
पीछे पड़ जाये मेरी जान को
वो आके मुझसे कुश्ती लड़ने लगे
और मैं पुकारने लगूँ भगवान को
तुम्हारे पिता जी देखने में ही खूसट लगते हैं,
हर वक़्त मुझे घूरते रहते हैं,
मैं कौन हूँ? क्या करता हूँ?
हर किसी से पूछते रहते हैं.
तुम्हरी माँ मुझे मुझे बहुत अच्छी लगती है,
कुछ नहीं कहती है,
पर एक कमी उसकी मुझे खलती है,
कहीं नहीं जाती वो , घर में ही रहती है
(तुमसे मिलाने नहीं आ पता हूँ !)
जब मियां बीवी राज़ी
तो क्या करेंगे पिताजी , माता जी
मैंने उन दोनों को समझाया
और प्यार से बताया
शादी तो मैं आपकी बेटी से ही करूँगा
दहेज़ में कुछ ज्यादा नहीं चाहिए
टीवी कार फ्रिज तो सही देते हैं
इसके अलावा दो चार लाख रूपया चाहिए
दहेज़ जैसी कुप्रथा आज भी
देश में चल रही है,
यही वो कारण है जिससे आज भी
बहुत सी औरतें जल रही हैं.

2 टिप्पणियाँ:

शालिनी कौशिक ने कहा…

शादी तो मैं आपकी बेटी से ही करूँगा
दहेज़ में कुछ ज्यादा नहीं चाहिए
टीवी कार फ्रिज तो सही देते हैं
इसके अलावा दो चार लाख रूपया चाहिए
yahi tareeka aaj hamare samaj me prachlit hai.

शिखा कौशिक ने कहा…

sarthak v sateek bat kahi hai aapne .aabhar

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