शनिवार, 2 जुलाई 2011

मुझे घर भी बचाना है, वतन को भी बचाना है.....चन्द बाते सिर्फ आपसे...

मित्रो बहुत पहले मैंने एक ग़ज़ल पढ़ी थी जिसे मैं आज भी गुनगुनाता हूँ .... कुछ दिनों आपसे दूर रहने के बाद वापस आया तो सोचा कुछ बाते हो जाय...  आपके लिए सबसे पहले " मुनव्वर राना" साहब की एक ग़ज़ल...

नुमायिस के लिए गुलकारियां दोनों तरफ से हैं.
लड़ाई की मगर तैयारियां दोनों तरफ से हैं..

मुलाकातों पर हँसते, बोलते गुनगुनाते हैं..
तबियत में मगर बेजारियां दोनों तरफ से हैं...

खुले रखते हैं दरवाजे दिलो के रात दिन दोनों..
मगर सरहद पर पह्रेदारियां दोनों तरफ से हैं..

उसे हालत ने रोका, मुझे मेरे मसायल ने..
वफ़ा की राह में दुश्वारियां दोनों तरफ से हैं..

मेरा दुश्मन मुझे तकता है, मैं दुश्मन को तकता हूँ..
की हायल राह में किलकारियां दोनों तरफ से हैं...

मुझे घर भी बचाना है, वतन को भी बचाना है..
मेरे कंधे पर जिम्मेदारियां दोनों तरफ से हैं. .

पढने पर यह लगता है की यह ग़ज़ल भारत और पाकिस्तान के लिए लिखी गयी है, पर यही हालत हमारे देश के अन्दर भी है. आज हम चाहे तो अपने दिलो को साफ करके अपने देश को विश्व का सिरमौर बना सकते है, पर नहीं राजनीतिज्ञों की तरह हम आपस के किसी न किसी विवादों में उलझे ही रहते है. कही मंदिर-मस्जिद तो कही जाति-धर्म के नाम पर झगडे शुरू हो जाते है. इतिहास गवाह है  व्यवस्था परिवर्तन कभी सत्ता से जुड़े लोग नहीं करते बल्कि रोजाना के झंझावतो से जूझ रही आम जनता करती है.. लोंगो ने सोचा होगा की देश आज़ाद होने  के बाद लोग सुख से जीवन बसर करेंगे. जिस मकसद के लिए हमारे पुरखो ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, वह मकसद अभी पूर्ण नहीं हुआ है. भ्रष्टाचार, तानाशाही, गुलामी आज भी कायम है, बस स्वरूप बदला गया है.
पहले विदेशी हम पर शासन करते है. अब अपने ही देश के चंद लोग कर रहे है. राजनीती सेवा नहीं व्यवसाय बनकर रह गयी है. हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. और हमारे दिलो में एक दूसरे के प्रति दूरियां आज भी कायम है.. अक्सर लोग कहते हैं की आपसी सौहार्द, भाईचारा, प्रेम कायम रखना होगा. पर इन लफ्जों का प्रयोग कब तक होता रहेगा. कब तक हम चंद लोंगो की चाल में फंसकर आपस में लड़ते रहेंगे.
आज चलन सा हो गया है, हर बातो को लोग धर्म और जाति से जोड़ देते हैं. ताकि लोग आपस में लड़ते रहे.. हमें मुद्दों के आधार पर उन सभी का समर्थन करना चाहिए जो देश हित में कार्य करते हैं. चाहे वह किसी भी धर्म या जाति के हो. . हालाँकि जब भी कोई आगे आयेगा, उसे यह साबित करना होगा की वह इमानदार है, आज बाबा रामदेव हो या अन्ना यदि उनका समर्थन करना है तो स्वाभाविक रूप से कई सवाल भी खड़े होंगे.
देश की जनता के साथ बार-बार विश्वासघात होता रहा है. वह छली जाती रही है. लिहाजा किसी पर सहज विश्वास नहीं कर पाती. मैं यहाँ पर किसी व्यक्ति विशेष की बात नहीं कर रहा हूँ, बाबा और अन्ना एक उदहारण स्वरुप है. धर्म की रक्षा के लिए जब भगवान श्री राम और योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया तो उनके ऊपर भी कई आरोप लगे. तब समाज इतना विकृत नहीं था. वे एक रावन और एक कंस के लिए आये थे. उन्हें पता था की उनका दुश्मन कौन है. पर आज अनगिनत रावन और कंस फैले है. जिनका संहार सहज ही नहीं किया जा सकता. स्वाभाविक रूप से देखा जाय तो आरोप-प्रत्यारोप उन्ही पर लगते हैं जो आगे बढ़कर कुछ करना चाहते है. अपनी जिम्मेदारियों से मुह मोड़कर घर में बैठने वालो पर कैसा आरोप लगेगा. हमें एकजुट होकर सिर्फ भारतीय होना होगा. आपस में जो शिकायते हैं उन्हें दूर करना होगा. एक दूसरे के प्रति दिल में जो प्रश्न घूमते रहते हैं. उन पर सवाल-जवाब करना होगा. जब तक हम एक दूसरे को संतुष्ट नहीं कर पाएंगे, तब तक विवाद ख़त्म होने के सवाल ही पैदा नहीं होते.
" भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" ब्लॉग नहीं मिशन है..
मित्रो, जब मैंने ब्लॉग लेखन में कदम बढाया तो इस दुनिया से अनजान था. ब्लोगों पर विचरण के दौरान देखा तो पाया की सब खुद को बड़ा बताने में ही लगे हैं. आरोप मढने में ही लगे है. यही स्तिथि साझा ब्लोगों पर भी थी. धार्मिक उन्माद यहाँ भी हावी था. बिना किसी नियम के. .. हमारी संस्कृति हमारी परम्परा हमारे जीवन का आधार है. इस पर प्रहार हम सहन नहीं कर पाते. फिर भी कुछ लोंगो की आदत बन चुकी है दूसरो को नीचा दिखाने की.. हमारे एक अज़ीज़ मित्र जो साझा ब्लॉग कई वर्षो से संचालित करते है.  उन्होंने एक लेख लिखा की "जापान में कहर"  इसलिए बरपा की वहा लोग इस्लाम को नहीं मानते. वे बड़े ही अच्छे लेखक है. मैं उनका सम्मान करता हूँ. पर उनकी इस बात पर हंसी आ गयी. ऐसे कई लेख उन्होंने लिखे है.
अब यदि कोई लेखक यह कह देता की इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान जैसे देश अशांत इसलिए है की वहा हिन्दू धर्म की अवहेलना होती है. हिन्दुओ को मारा जाता है. पर आज तक किसी ने नहीं कहा ... हमारे एक बहुत ही अच्छे मित्र और जिन्हें मैं ब्लॉग जगत में अपना गुरु भी मानता हूँ.. उनसे मैंने काफी कुछ सीखा है. वे महापुरुषों, ऋषियों, मुनियों, मनु आदि के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, पर अंत में वह कह देते हैं की सनातन धर्म आज का इस्लाम है. ऐसी बेहूदगी बातो से हमें बचाना होगा. उनके शब्दों का सार यही है की सभी लोग इस्लाम अपना ले. जो संभव नहीं हो सकता उन बातो को करके हम नाहक विवाद पैदा क्यों करे. ऐसे तमाम लोंगो के उदाहरण है, पर दो लोंगो के सिर्फ मैंने इसलिए दिए क्योंकि दोनों लोग मेरे अज़ीज़ है और मेरी बातो का बुरा नहीं मानते.
आजकल जो मुद्दे चल रहे हैं. सभी भारतीयों को एकजुट होकर उनपर गंभीर होना होगा. धर्म को राजनीती से अलग रखना होगा.
और अंत में..........
भारतीय ब्लॉग लेखक मंच की स्थापना ११ फरवरी २०११ को हुयी, इस मंच को हमने परिवार की संज्ञा दी, ताकि हमारे सभी हिंदी लेखक भाई एक परिवार की तरह मिलजुल कर रहे, अपनी शिकायते भी दर्ज कराये तो भी गरिमा के साथ. हार परिवार में कुछ न कुछ बाते होती रहती हैं, यहाँ भी होगी पर उसे दिल पर ले लेना या व्यक्तिगत बना लेना कही से भी उचित नहीं है. आप सभी के प्रेम की ही देन है की अल्प समय में यह मंच उन बुलंदियों की ओर कदम बढ़ा रहा है. जिसकी कल्पना शायद हमको भी नहीं थी. इसमें आप सभी लेखको व पाठकों तथा समर्थको का सहयोग है. इसके लिए मैं विशेष रूप से योगेन्द्र जी का शुक्रगुजार हूँ. जिन्होंने अपना कीमती समय इस मंच के लिए हमेशा दिया और दे रहे हैं. 
काफी दिनों तक दूर रहने के बाद फिर परिवार में लौटा तो सोचा कुछ दिल की बात कर ली जाय. आप सभी के सहयोग साधुवाद ...
जाते-जाते चन्द लाईने........
चन्द लोंगो की यही कोशिश रही है दोस्तों....
आदमी का आदमी से फासला बढ़ता रहे...
अपनी आँखों से हमें भी खोलनी हैं पट्टियाँ.
फायदा क्या है की अँधा काफिला चलता रहे....

8 टिप्पणियाँ:

ajit gupta ने कहा…

सबसे पहले तो आपका आभार कि आपने मुनव्‍वर राणा की इतनी खूबसूरत गजल पढने को दी। कोई शब्‍द नहीं बचे, तारीफ के लिए। आपके विचार तो अपने से ही लगे, इसलिए भी आभार।

saurabh dubey ने कहा…

हरीश जी पढ़ के बहुत अच्छा लगा एक सुंदर रचना प्रकाशित करने के लिये धन्यवाद

mahendra srivastava ने कहा…

पूरी तरह से सहमत

शिखा कौशिक ने कहा…

gazal kee tarah aapke vichar bhi bahut khoobsoorat hain .bahut din bad yahan yah post dali hai aapne .achchhi lagi .

हरीश सिंह ने कहा…

धन्यवाद अजित जी, सौरभ जी, महेंद्र जी, शिखा जी आपका बहुत-बहुत आभार ......

शालिनी कौशिक ने कहा…

चन्द लोंगो की यही कोशिश रही है दोस्तों....
आदमी का आदमी से फासला बढ़ता रहे...
अपनी आँखों से हमें भी खोलनी हैं पट्टियाँ.
फायदा क्या है की अँधा काफिला चलता रहे....
bahut sundar prastuti hai aapki aur usse bhi adhik sukhad vapsi hai aapki.vaise aisee prastuti dekh kar to ye nahi lagta ki kisi se dar hui vapsi aapki.only for fun ha ha ha ....

Babli ने कहा…

बहुत ही बढ़िया और शानदार प्रस्तुती!

Dr. shyam gupta ने कहा…

गज़ल का तो क्या कहाजाय ...सुन्दर है ही..

--हाँ सम सामयिक प्रस्तुतिकरण व सुन्दर आलेख के लिये बधाई एवं आभार....

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