गुरुवार, 2 जून 2011

कविता---दष्ठौन-- डा श्याम गुप्त...


पुत्री के जन्म दिन पर
दष्ठौन, पार्टी!
कहा था आश्चर्य से
तुमने भी |
मैं जानता था पर-
मन ही मन,
तुम खुश थीं ;
हर्षिता, गर्विता |

दर्पण में
अपनी छवि देखकर,
हम सभी प्रसन्न होते हैं ;
तो अपनी प्रतिकृति देखकर -
कौन हर्षित नहीं होगा |

पुत्र जन्म पर यह सवाल-
क्यों नहीं किया था तुमने ?
मैंने भी पूछ लिया था
अनायास ही |
इसका उत्तर-
लोगों के पास तो था ,पर-
नहीं था तुम्हारे पास ही |

प्रकृति-पुरुष,
विद्या-अविद्या ,
ईश्वर-माया,
शिव और शक्ति ;
युग्म होने पर ही -
पूर्ण होती है,
यह संसार रूपी प्रकृति |

अतः गृहस्थ रूपी संसार की ,
पूर्णाहुति में ही है,
यह पार्टी

10 टिप्पणियाँ:

Anita ने कहा…

सही कहा है आपने स्त्री-पुरुष दोनों के योगदान से ही चलता है सृष्टि का क्रम, पुत्री के जन्मदिन पर पार्टी होनी ही चाहिए...

शालिनी कौशिक ने कहा…

aapki kalam jab is vishay par aage badhti hai to gazab dhati hai.badhai aapko bhi aur samast nari jati ko bhi .

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सच कहा है..हमें आज अपनी सोच बदलनी होगी. बेटी के निस्वार्थ प्यार को आप और कहीं कहाँ पा सकते हैं ?..बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद शालिनी जी...अनिता जी...

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद शर्मा जी...सच कहा...कल भी और आज भी बेटियां मलयज़ पवन के झोंके के समान होती है....

kase kahun? ने कहा…

पुत्र जन्म पर यह सवाल-
क्यों नहीं किया था तुमने ?
मैंने भी पूछ लिया था
अनायास ही |
इसका उत्तर-
लोगों के पास तो था ,पर-
नहीं था तुम्हारे पास ही |bahut mahatvpoorn prashna hai ye....jo samaj ki soch se sankramit hui maa ki soch darshata hai...lekin ma to maa hai...

Mithilesh dubey ने कहा…

khubsurat rachna ke liye badhayi

हरीश सिंह ने कहा…

बेटा-बेटी का अंतर,
जीवन के उन्मूलों में.
तितली जैसी चहक रहीं है,
फूलों में और शूलों में.
चाँद से लेकर धरती तक,
पहचान बनी हैं ये बेटी.
सफल मार्ग के दुर्गम पथ का,
दंभ हरीं हैं ये बेटी.
दुर्गा है,माँ काली है, साक्षात् माँ वागीश्वरी.
त्रिलोक्य पूज्य भवानी,जीवन की परमेश्वरी.
फिर क्यूं बंध,कलुष है,

मदन शर्मा ने कहा…

दहेज़ के दानव की विकरालता की वजह से ही आम जनता का मोह लड़कियों की और से घटा है जब की इस समस्या के लिए माँ बाप खुद ही जिम्मेदार हैं | ये बहुत ही दुखद स्थिति है | समाज के इस कमजोर नस को आपने कविता के माध्यम से बहुत सही प्रस्तुत किया है
आपको मेरी हार्दिक शुभ कामनाएं !

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद...कासे कहूं, , मिथिलेश दुबे व शर्मा जी...व हरीश जी..सुन्दर कविता के लिये...

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