बुधवार, 29 जून 2011

प्रेम काव्य-महाकाव्य.. षष्ठ सुमनान्जलि--रस श्रृंगार-संयोग( क्रमश:)- गीत-३ .. -----डा श्याम गुप्त








6 टिप्पणियाँ:

Mukesh Kumar Mishra ने कहा…

तुम दीपक हो मैं बाती हूँ,
तुम जीवन का सार |



गीत सुन्दर है...........विशेषकर उपरोक्त पंक्तियाँ

गंगाधर ने कहा…

सुन्दर भावमयी रचना. बधाई.

शालिनी कौशिक ने कहा…

तुम पर सारा जीवन वारूं ,
वारी सब संसार |
तुम्हीं प्यार की प्रथम किरण हो,
तुम ही अंतिम प्यार |
मैंने तुमसे किया है प्यार ||
sundar bhavmayee.

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

बहुत सुन्दर भावनाएं श्रृंगार रस से ओत-प्रोत

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद ..शालिनी, ड़ा नूतन, गंगाधर व मिश्र जी... श्रृगार ..रसराज है ...

हरीश सिंह ने कहा…

सुन्दर भावमयी रचना. बधाई.

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