मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

बहा के उनका सामान ......






बहा के उनका सामान दरिया में
सोचा था मुक्त हो जाऊँगी
अहसासों  के दलदल से .
लेकिन यह तो  वह आग है
जो न जलती है ना बुझती है
बस सुलगती जाती है .....
उस जीव की तरह -
जो मुक्त हुआ भी
लेकिन मुक्त हो ना पाया
शरीर के छूट जाने पर भी
मोह में जकड़ा बंधा सा .......




प्रियंका राठौर






5 टिप्पणियाँ:

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

isi ka naam ziwan hai aur hum sansarikta se jab tak jude hain is bandhan se nahi chhut payengen .. koi sath ho ya sath chhut chuka ho kisi ka yaden to aani hain .......behtreen prstuti

ana ने कहा…

bahut sundar post dil ko chhoo gayi

ashok kumar verma 'bindu' ने कहा…

VERY GOOD!

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

क्या बात है .
वाह .

kirti hegde ने कहा…

VERY GOOD!

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