रविवार, 24 अप्रैल 2011

भगत सिंह

यश पाण्डेय द्वारा PBA में लिखा गया लेख आप सभी बन्दुओं से साझा करने के लिए
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शहीद ऐ आजम भगत सिंह 

इस क्रांतिवीर के परिचय की कोई आवश्यकता नहीं ,ये वो वीर है जो देशभक्त नौजवानों के अन्दर एक शोले की तरह अपने बुझ जाने के ८० वर्ष बाद भी जल रहा और चीख चीख कर कह रहा है -इन्कलाब जिंदाबाद !
                                        साम्राज्यवाद का नाश हो !
खान्ग्रेस और भ्रष्ट राजनेताओं ने शहीद भगत सिंह और उनके साथियों सुखदेव ,राजगुरु ,चंद्रशेखर आजाद आदि को आतंकवादी कह इस देश की आत्मा पर करार थप्पड़ मारा है किन्तु सत्य कभी छुप नहीं सकता और इन्कलाब आ कर रहेगा चाहे ये कांग्रेसी कितनी भी कोशिश कर लें शहीदों को दबाने की किन्तु वो तो लोगों के ह्रदय में बस चुके हैं उन्हें कौन हटा सकता है ,भगत सिंह क्रांति का सूर्य बन कर सदैव चमकते रहेंगे और एक दिन हम उन्हें भारतीय नोटों पर ला कर उनकी शहादत से न्याय करेंगे |
इनकी जीवनी प्रस्तुत कर के मैं इनके बलिदान को ताजा रखने का प्रयत्न कर रहा हूँ,आशा है आपको मेरा यह प्रयत्न पसंद आयेगा 
-इन्कलाब जिंदाबाद !

शहीद भगत सिंह का जन्म सन १९०७ में पंजाब के लायालपुर नाम के गाँव में हुआ था इनके दादा सरदार अर्जुन सिंह,परम देशभक्त , समाज सुधारक और महर्षि दयानंद के शिष्यों में एक थे ,इनके पिता सरदार किशन सिंह और इनके दोनों चाचा सरदार अजित सिंह और स्वर्ण सिंह अंग्रेजी राज्य के कड़े शत्रु थे ,इनकी माता का नाम विद्यावती था |
इनके पैदा होने के समय अंग्रेजों के अत्त्याचार अपने चरम पर थे, इस देश की रीढ़ की हड्डी किसानों की फासले लूट लेते थे अँगरेज़ ,जो किसान लगान न चूका पाए उसे दाने दाने के लिए तरसा दिया जाता और ये अँगरेज़ दुष्ट पूंजीपतियों के साथ किसान का खून चूस कर अपने जेबें भरते ,एक तरफ किसानों और मजदूरों के साथ ये अन्याय ,दूसरी तरफ देश की जनता को कीड़े मकोड़ों की तरह कुचल कर मार डालते ,और जो क्रांतिकारी इसका विरोध करते उसे फांसी के फंदों पर चढ़ा कर जालिम अंग्रेजी हुकूमत अपनी दरिन्दिगी की भूख मिटाती ,,यह देश जिसे सोने का खग कहा जाता अंग्रेजों ने यहाँ का धन ,ज्ञान ,विज्ञानं और शिक्षा पद्दति लूट कर इस देश को कंगाल कर दिया ,इस कारण आम आदमी ,किसान और भारतवासी अपने आप को ठगा हुआ ,दीन ,हीन समझने लगे  ये देशभक्त नौजवानों से सहन न हुआ इस कारण  उन्होंने पूरे भारत में लोगों का स्वाभिमान जगाने के लिए आन्दोलन आरंभ किय विशेष रूप से पंजाब में यह आन्दोलन जोर पकड़ा पंजाब में यह आन्दोलन भगत सिंह के पिता और उनके दोनों चाचा पगड़ी संभल जट्टा आन्दोलन चला रहे थे ,विशेष रूप से सरदार अजीत सिंह इस आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे और अँगरेज़ सरकार के सबसे खतरनाक शत्रुओं में से एक थे | भगत सिंह के जन्म के समय इनके पिता और दोनों चाचा जेल में बंद थे , इनके पैदा होते ही वो तीनो उसी दिन छुट गए इस कारण भगत सिंह को परिवार में बड़ा भाग्यशाली माना  गया इस कारण दादी जैकौर ने अपने पोते का नाम भगतसिंह रखा और वो उसे प्यार से भागोवाला बुलाती थीं |
भगतसिंह के जन्म लेते ही परिवार में खुशियाँ आ गयीं ,पूरा परिवार मिल गया ,किन्तु सत्य है -"चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात " समय ने करवट बदली इनके चाचा स्वर्ण सिंह जेल में अंग्रेजों द्वारा किये गए अत्त्याचार से तपेदीक की चपेट में आ गये और उसी के चलते २३ वर्ष की उम्र में अपनी पत्नी हुकुम कौर को रोता छोड़ शहीद हो गये , पूरा परिवार गम में डूब गया ,और दुसरे चाचा अजीत सिंह को अंग्रेजों ने फिर पकड़ लिया किन्तु वो उनसे बच निकले और देश के बहार चले गए ताकि वो अपने देश की आजादी की मशाल विदेशों में जला कर हिन्दुस्थानियों को एकत्र करें और उनकी पत्नी हरनाम कौर भी वियोग की आग में जलने लगीं ,दादा अर्जुन सिंह बूढ़े हो चले थे इसलिए घर की साड़ी जिम्मेदारी सरदार किशन सिंह पर आ गयी इस कारण उन्हें भी क्रांति से संन्यास लेना पड़ा और अपनी खेती बाड़ी देखनी पड़ी और अपने परिवार का ध्यान रखना पड़ा , भगत सिंह के ग्यारह वर्षीय भाई जगत सिंह की भी मृत्यु हो गयी ,यह परिवार के लिए एक और झटका था ,अब परिवार में केवल भगत सिंह ही थे जो क्रांति को आगे बाधा सकते थे ,सरदार किशन सिंह की उम्मीदें भगत सिंह पर थीं और निश्चय ही वो अपनी उम्मीदों से कहीं ज्यादा पाए |
 बालक भगत सिंह बचपन से ही अंग्रेजों के अत्त्याचार को देख रहा था और अंग्रेजों के प्रति उसके  मन में घृणा की अग्नि जल रही थी .जब भगत सिंह ८-१० वर्ष के हुए तभी से राजनीति का पूरा ज्ञान रखने लगे ,और क्रांतिकारियों की जीवनियाँ पढने लगे ,वो बचपन से ही तर्कशास्त्री थे कोई भी ऐसा नहीं था जो उनके तर्क को काट सके ,भगत सिंह क्रांतिकारियों में अपने चाचा सरदार अजीत सिंह और शहीद  करतार सिंह साराभा को अपना आदर्श मानते थे,साराभा का चित्र तो सदैव उनकी जेब में रहता  | जलियावाला बाग़ की घटना के बारे में सुन कर १२ वर्षीय भगत सिंह क्रोध से तिलमिला उठे और जलियावाला बाग़ की घटना के अगले दिन वो स्कूल जाने के बहाने सीधे  अमृतसर के जलियावाला बाग़ पहुंचे 
और पुलिस की नज़रों से बचते बचाते उस भीषण नरसंघार के घटना स्थल पर पहुंचे और खून से लतपथ मिटटी को उस बोतल में भर लिया जिसे वो अपने साथ लाये थे ,वो उस मिटटी पर प्रतिदिन रोज फूल माला चढाते ,वो सोचने लगे "मात्र शहीदों को याद करना पर्याप्त नहीं हमे स्वयं उनका मार्ग अपनाना होगा" | असहयोग आन्दोलन देश भर में जोर पकड़ने लगा यहाँ दुर्भाग्य से भगत सिंह गांधी की चिकनी चुपड़ी बातों में आ कर उनके समर्थक बन गए और असहयोग आन्दोलन के लिए अपनी नवी कक्षा की पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका यह भ्रम जल्दी ही टूट गया जब गांधी ने चौरी चौरा के बाद अपना असली रंग दिखा आन्दोलन बंद कर दिया अ,इसकी देश भर में निंदा हुई ,भगत सिंह की गांधी के प्रति भक्ति चूर चूर हो गयी | जिन विद्यार्थियों ने असहयोग आन्दोलन के समय अपनी पढाई छोड़ दी थी उनके लिए शेर ऐ पंजाब  महापुरुष लाला लाजपत राय ने नेशनल कॉलेज खुलवाया ताकि वो अपनी पढाई कर सकें ,१७ वर्षीय भगत सिंह ने भी नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया ,ये एक क्रांतिकारी कॉलेज था जो पढाई के साथ साथ नवयुकों को देश की स्वतंत्रता के लिए तैयार करता था ,यहाँ पर भगत सिंह का परिचय अपनी ही तरह विचारधारा रखने वाले नवयुकों से हुआ इनमे प्रमुख थे सुखदेव ,भगवती चरण वोहरा  ,यशपाल ,विजयकुमार ,छैलबिहारी ,झंडा सिंह और जयगोपाल ( जो बाद में गद्दार सिद्ध हुआ ) सुखदेव और भगवती चरण भगत सिंह के सबसे घनिष्ट मित्र थे ,भगत सिंह और सुखदेव तो एक प्राण दो देह हो गये ,सुखदेव और भगत सिंह एक दुसरे के बिना पूर्ण न थे ,भगत सिंह ,सुखदेव और भगवती चरण वोहरा ने मिलकर "नौजवान भारत सभा " नाम का क्रांतिकारी संगठन बनाया जिसमे नौजवानों को क्रांति के लिए तैयार किया जाता और देश के शहीदों का स्मरण करवाया जाता , इसी बीच तीनो मित्रों ने समाजवाद और कम्युनिस्म पर कई पुस्तकें पढ़ीं ,मार्क्स की रचनाएँ पढ़ीं और इससे प्रभावित हुए भगत सिंह और भगवती चरण तो समाजवाद के सबसे बड़े समर्थक बने ( किन्तु आज के वामपंथ के नहीं ) | घरवालों ने भगत सिंह से विवाह करने को कहा किन्तु भगत सिंह ने अपना उद्देश्य उन्हें बता दिया की उनका पूरा जीवन देश को गुलामी और अन्याय की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए समर्पित हो चूका है और विवाह  की बेड़ियाँ वो अपने पैर में नहीं पहन सकते | भगत सिंह ने अपने समय के सबसे बड़े क्रांतिकारी भारत माँ के शेर  नौजवान चंद्रशेखर आजाद से भेंट की जो हिंदुस्तान प्रजातान्त्रिक संघ के सदस्य थे और अपने प्रहारों अंग्रेजों की नीव हिला रहे थे ,वो अंग्रेजों के सबसे खतरनाक शत्रु बन गए थे | दोनों नौजवानों ने एक दुसरे को समझा और एक दुसरे से प्रभावित हुए और भगत सिंह तो आजाद के प्राणप्रिय बन गए उस समय हिंदुस्तान प्रजातान्त्रिक संघ बिखर चूका था उसके बड़े बड़े सदस्य जैसे रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्ला खान शहीद हो चुके थे और कईयों को उम्रकैद और कालापानी मिल चूका था | आजाद का मनोबल टूट चूका था किन्तु भगत सिंह ने उन्हें हिम्मत दी ,और अपने मित्रों और प्राणप्रिय सुखदेव  सहित नौजवान भारत सभा छोड़ कर हिंदुस्तान प्रजातान्त्रिक संघ में आ गए ,अन्य साथी भी देश के कोने कोने से आ गए और दल में जुड़ गए यहीं से उनका परिचय एक और महत्वपूर्ण क्रांतिकारी   राजगुरु से हुआ जो कुशल निशानेबाज और बहुत साहसी थे ,भगत सिंह ने अपने समाजवाद के विचार आजाद जी को बताये ,आजाद जी उससे काफी प्रभावित हुए  और बहुत विचार विमर्श कर इस दल को हिंदुस्तान प्रजातान्त्रिक संघ से हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक संघ रख दिया गया इसी विषय में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में २८ सितम्बर १९२८ को अखिल भारत क्रांतिकारी सभा हुई और उसमे यह निर्णय लिया गया की दल के आक्रमण पक्ष के सेनापति आजाद जी और चिंतन पक्ष के सेनापति भगत सिंह होंगे | भगत सिंह ने इन दिनों क्रांतिकारी लेख लिखना शुरू कर दिया जिससे वो पुलिसे के नज़रों में आ गये और पुलिसे उन पर नजर रखने लगी | सायमन कमीशन भारत आ चूका था यह कमीशन अंग्रेजी तानाशाही सरकार की हिन्दुस्थानियों को धोका देने की नयी चाल थी ,पूरे भारत में इसका विरोध हुआ ,लाहौर में इसका विरोध लाला लाजपत राय के नेत्रत्व में हुआ ,लाहौर में विरोध प्रदर्शन के समय लाला लाजपत राय और अन्य भारतवासियों का जोश देख कर पुलिस अधिकारी स्कॉट बौखला उठा और उसने अपने सहयोगी सांडर्स से कहा की भीड़ को मार मार कर पीछे करो ,निर्दय सांडर्स ने भीड़ को छोड़ कर सीधे लाला लाजपत राय पर प्रहार किया जिससे लाला लाजपत के सीने पर गंभीर चोटें आयीं और यह अपमान की उनको एक साधारण अँगरेज़ अफसर ने निर्दयता से मारा को सहन न कर सके और १७ नवम्बर १९२८ को उनकी मृत्यु हो गयी ,भगत सिंह ,सुखदेव ,आजाद और राजगुरु समेत उनका पूरा दल इस अपमान को सहन न कर सका और उन्होंने लाला लाजपत राय  की मृत्यु को राष्तिर्य अपमान मानते हुए प्रतिशोध  लेने की ठानी , उन्होंने स्कॉट को मारने की योजना बनायीं और इस योजना के  सूत्र धार सुखदेव बने ,भगत सिंह और राजगुरु को वध का काम सौंपा गया और चंद्रशेखर आजाद को उन दोनों की रक्षा का ,१७ दिसंबर  १९२८ को जयगोपाल के इशारा करने पर भगत सिंह और राजगुरु ने स्कॉट की बजाय सांडर्स का वध कर  दिया ,क्योंकि जयगोपाल से पहचानने में चूक हो गयी ,आजाद ने उन दोनों का बचाव किया और बचाव में एक अन्य सिपाही मारा गया | सांडर्स के मारे जाने से भी बदला पूरा हुआ क्योंकि लाठी तो सांडर्स ने ही चलायी थी यही सोच थी उस समय दल की ,वो तीनो घटना स्थल से सुरक्षित निकल गए , सांडर्स के वध ने पूरे देश में खलबली मचा दी और पुलिस भगत सिंह ,आजाद  और राजगुरु को ढूँढने लगी ,भगत सिंह ने अपनी दाढ़ी सफाचट करवा ली और विलायती टोपी ,OVERCOAT पहन कर बिलकुल विलायती बाबु बन गए और भगवती चरण की पत्नी दुर्गा भाभी  उनकी पत्नी के वेश में  और राजगुरु जो नौकर के वेश में थे उनके साथ सुरक्षित लाहौर से निकल गए ,आजाद साधू के वेश में लाहौर ने निकल गए | भगत सिंह कलकत्ता पहुंचे और कांग्रेस अधेवेशन में ढोंगी कांग्रेसियों की अर्ध स्वराज्य की मांग सुन निराश हो गये और उन्होंने अपने काम को आगे बढ़ने के लिए पूरे भारत में बम के कारखाने खोल दिए | इधर अंग्रेजों ने अपना दमनचक्र तेज करने के लिए दो कानून पास करने की सोची एक था -पब्लिक सेफ्टी बिल जिससे किसी भी क्रांतिकारी को बिना वारंट पकड़ लिया जा सकता था और बिना मुकदमे फांसी या काला पानी दिया जा सकता था और दूसरा था  ट्रेड डिस्प्यूट बिल जिससे किसानों और मजदूरों पर पूंजीपतियों के साथ मिलकर अन्याय किया सके और वो इसके विरोध में प्रदर्शन भी न कर सकें | भगत सिंह यह पढ़कर बहुत चिंतित हुए उन्होंने फ्रांस के क्रांतिकारी वेलां के बारे में पढ़ रखा था जिससे वो प्रभावित हुए थे उन्होंने सोचा" क्यों न हम भी वेलां की तरह  संसद में बम फोड़ कर सबको चौका दें" |  उन्होंने आजाद को यह योजना बताई ,आजाद को  योजना पसंद आई और उन्होंने स्वीकृति दे दी भगत सिंह ने बताया की बम फेंकने वाला भागेगा नहीं बल्कि वो अपने को गिरफ्तार करवाएगा ताकि वो मुक़दमे के माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत का भन्दा फोड़ सके और उसे दुनिया के सामने नंगा कर सके ,भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अपने आप को इस कार्य के लिए प्रस्तुत किया  ,आजाद  भगत सिंह को भेजना नहीं चाहते थे किन्तु भगत सिंह की हथ के आगे वो हार गये और विवश हो कर स्वीकृति दे दी | भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेजी संसद में दोनों बिलों के पास होते समय खाली जगह   दो समय बम फोड़े ,संसद धुवें से और भयंकर ध्वनी से काँप उठा ,सब लोग इधर -उधर भागने लगे ,भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बड़े जोर से -"इन्कलाब जिंदाबाद! "
और साम्राज्यवाद का नाश हो ! का नारा लगाया और उसके बाद कुछ पर्चे फेंके जिनमे लिखा था -"बहरों को सुनाने के लिए लिए धमाके की आवश्कयता होती है "
उसके बाद उन्होंने अपने आप को गिरफ्तार करवाया | इस घटना ने पूरे भारत और वायसराय के साथ इंग्लैंड को भी हिला कर रख दिया तब से भगत सिंह और दत्त नौजवानों की प्रेरणा बन गए और देश के बच्चे -बच्चे की जुबान पर भगत सिंह और दत्त का नाम था और उनका दिया गया नारा इन्कलाब जिंदाबाद अब राष्ट्रीय नारा बन चूका था ,किन्तु गाँधी और नेहरु जैसे पापियों ने बम फेंकने का विरोध किया | भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर मुकदमा चला और मुकदमे में भगत सिंह ने अपना जो बयान दिया वोह हम संक्षेप में लिख देते हैं ,उन्होंने कहा -"हमने बम किसी की जान लेने के लिए नहीं बल्कि अंग्रेजी हुकूमत को यह चेतावनी देने के लिए फोड़ा की भारत अब जाग रहा है ,तुम अपनी गन्दी गाँधी हरकतें बंद करो , तुम हमे मार सकते हो हमारे विचारों को नहीं | बड़े बड़े साम्राज्य नष्ट हो गये किन्तु विचार आज भी जीवित हैं जिस प्रकार आयरलैंड और फ्रांस स्वतंत्र हुआ उसी प्रकार भारत भी स्वतंत्र हो कर रहेगा और भारत के स्वतंत्र होने तक नौजवान बार बार अपनी जान देते रहेंगे और फांसी के तख्ते पर चिल्ला कर कहेंगे -"इन्कलाब जिंदाबाद "! भगत सिंह और दत्त के इस बयान ने उन्हें जनता का नायक बना दिया ,अंग्रेजों ने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को बम फेंकने के अपराध में आजीवन कारावास का दंड दिया | भगत सिंह और दत्त दिल्ली जेल में रखे गए ,उसके बाद पुलिस ने सुखदेव ,राजगुरु ,यशपाल ,जतिन दास समेत पूरे भारत से  लगभग ९९% क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया ,बस चंद्रशेखर आजाद को पुलिस पकड़ने में असमर्थ रही , जैगोपाल सरकारी गवाह बन गया जिसके कारण सांडर्स वध का मुकदमा आरंभ हो गया इसे लाहौर षड्यंत्र केस द्वितीय कहा गया | भगत सिंह का असली युद्ध अब शुरू हुआ ,भगत सिंह और दत्त को दिल्ली से लाहौर जेल में भेज दिया गया जहाँ पर लाहौर षड्यंत्र का मुकदमा आरंभ हुआ ,भगत सिंह और उनके साथियों ने मुक़दमे को बहुत लम्बा खींचा ,कभी भगत सिंह ऐसे ऐसे बयान दे देते जिससे जज तिलमिला उठता और कभी इन्कलाब जिंदाबाद और हंसी मजाक शुरू हो जाता जिससे पुलिस क्रांतिकारियों को पीटती विशेष रूप से भगत सिंह और सुखदेव को क्योंकि दोनों ही पुलिस को बहुत सताते | अंग्रेजों ने भगत सिंह और सुखदेव को एक दूसरी के प्रति भड़काने का प्रयत्न किया लेकिन शैतानों के ये मनसूबे भी विफल हुए | जब पुलिस क्रांतिकारियों को मारती तो जनता तक यह बात पहुँचती और वो क्रोधित हो जाती भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारी इससे बहुत प्रसन्न होते ,क्योंकि वोह चाहते भी यही थे , भगत सिंह और उनके साथियों ने जेल में क्रांतिकारियों पर हो रहे अत्त्याचारों के विरोध में तक भूख हड़ताल की ,अँगरेज़ हुकूमत ने इसे हड़ताल तोड़ने की कई कोशिश की लेकिन असफल हुई ,इधर जनता का गुस्सा अंग्रेजों के प्रति  और क्रांतिकारियों के प्रति प्रेम बढ़ता जा रहा था , पूरे देश भूख  हड़ताल शुरू कर दी जिससे अंग्रेजी हुकूमत बहुत डर गयी ,जेल में भूख हड़ताल के दौरान क्रांतिकारी जतिन दास की मृत्यु ने और बगावत पैदा कर दी अंत में सरकार को झुक कर जेल की दशा सुधारनी पड़ी | यह क्रांतिकारियों के जीत थी , लाहौर षड्यंत्र केस में जैगोपाल की गवाही बहुत खतनाक सिद्ध हुई | अंत में मुक़दमे का फैसला आ गया जिसमे भगत सिंह ,सुखदेव और राजगुरु को सांडर्स वध  के अपराध  में  मृत्युदंड मिला और उनके अन्य साथियों को  भी लम्बी सजाएँ और काला पानी हुआ | पूरा देश ये सजा सुन रो पड़ा ,देश  भगत सिंह की फांसी रोकना चाहता था लोगों की उम्मीद गाँधी से थी की  वही कुछ कर सकता है किन्तु उस गांधी ने भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु  को बचाने  के नाम पर राजनीति की गन्दी रोटियां सेंकी और उन्हें बचने का नाम नहीं लिया गांधी इरविन पैक्ट में |  अंत में २३ मार्च १९३१ को शाम ७ बजकर ३३ मिनट पर माँ भारती के तीन सपूत भगत सिंह ,सुखदेव और राजगुरु फांसी के तख्ते पर अमर हो गए |
और मरने तक तीनों के मुख पर एक ही 
नारा था 
-इन्कलाब जिंदाबाद !
इन्कलाब जिंदाबाद !
इन्कलाब जिंदाबाद !

काल ने तीनों मृत्युन्जों को वरदान दिया -चिरंजीवी  भव !
                                                              चिरंजीवी भव !
                                                       चिरंजीवी भाव !     
  




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Posted By Yash Pandey in PBA

4 टिप्पणियाँ:

vishwajeetsingh ने कहा…

आदरणीय आशुतोष जी भगत सिंह के बारे में इस इतिहास लेख को पढने के बाद यश के बारे में सोचने को मजबूर होने पडा , आपके अनुसार यश पाण्डेय नौवी कक्षा का छात्र है लेकिन मुझे तो ज्ञान के मामले में यश पीएचडी जान पडता हैं । यश पाण्डेय का औजस्वी यश पूरे विश्व में फैले हार्दिक शुभकामनाएँ ...... आभार ।
इरविन - गांधी समझौता और भगतसिंह की फाँसी भाग - एक , दो
www.vishwajeetsingh1008.blogspot.com

हरीश सिंह ने कहा…

yash ko bahut bahut shubhkamna.

Mithilesh dubey ने कहा…

यश पाण्डेय का औजस्वी यश पूरे विश्व में फैले हार्दिक शुभकामनाएँ ...... आभार ।

Dr. shyam gupta ने कहा…

होनहार विरवान के होत चीकने पात ...

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