शुक्रवार, 11 मार्च 2011

समलैंगिकता एक पुरुष से उसका पुरुषत्व और एक महिला से उसका स्त्रीत्व छीन लेता है.


खाने और कपड़े की तरह काम वासना भी मनुष्य की मौलिक आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति मनुष्य की स्वाभाविक मांग है । ईश्वर ने मनुष्य के लिए जो जीवन व्यवस्था निर्धारित की है उसमें उसकी इस स्वाभाविक मांग की पूर्ति की भी विशेष व्यवस्था की है । ईश्वर ने अपनी अन्तिम पुस्तक में मनुष्य को कई स्थानों पर निकाह करने के आदेश दिये हैं । ईश्वरीय मार्गदर्शन को मनुष्यों तक पहुंचाने वाले अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने भी निकाह को अपना तरीक़ा बताया है और कहा है कि जो ऐसा नहीं करता है वह हम में से नहीं । इतना ही नहीं ईश्वरीय जीवन व्यवस्था में इसका भी ध्यान रखा गया है कि कुछ लोगों की कामवासना की तृप्ति एक निकाह से नहीं हो सकती है, तो उनके लिए कुछ शर्तों के साथ एक से अधिक (अधिकतम चार) निकाह करने के द्वारा भी खुले रखे गये हैं । इतना कुछ करने के बाद दूसरे सभी यौनाचारों को अवैध और अक्षम्य अपराध ठहराया गया है ।

सम्पूर्ण मानवता के लिए सर्वाधिक अनुकूल ईश्वरीय विधन में अनुचित हस्तक्षेप करते हुए यौन दुराचार के कई रूपों को पश्चिमी देशों ने अपने यहां वैध ठहरा लिया है, जिनमें से समलैंगिक व्यवहार विशेष रूप से उल्लेखनीय है । पश्चिम के अंधनुकरण की परम्परा को बनाए रखते हुए हमारे देश में भी समलैंगिकता को वैध ठहराये जाने की दिशा में पहला क़दम उठाया जा चुका है। दिल्ली हाईकोर्ट का फै़सला आते ही देश में कोई दर्जन भर समलिंगी विवाह हो चुके हैं, जिससे यहां का सामाजिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक  ढांचे के चरमरा जाने का भय उत्पन्न हो गया है और प्रबुद्ध समाज स्वाभाविक रूप से बहुत चिंतित हो गया है

समलैंगिकता को एक घिनौना और आपत्तिजनक कृत्य बताते हुए ईश्वर ने मानवता को इससे बचने के आदेश दिये हैं—
‘‘क्या तुम संसार वालों में से पुरुषों के पास जाते हो और तुम्हारी पत्नियों में तुम्हारे रब ने तुम्हारे लिए जो कुछ बनाया है उसे छोड़ देते हो । तुम लोग तो सीमा से आगे बढ़ गये हो ।’’ (क़ुरआन, 26:165-166)

क्या तुम आंखों देखते अश्लील कर्म करते हो? तुम्हारा यही चलन है कि स्त्रियों को छोड़कर पुरुषों के पास काम वासना की पूर्ति के लिए जाते हो? वास्तविकता यह है कि तुम लोग घोर अज्ञानता का कर्म करते हो । (क़ुरआन, 27:54-55)


इस संबंध में क़ुरआन में और भी स्पष्ट आदेश मौजूद हैं—
‘‘क्या तुम ऐसे निर्लज्ज हो गए हो कि वह प्रत्यक्ष अश्लील कर्म करते हो जिसे दुनिया में तुम से पहले किसी ने नहीं किया? तुम स्त्रियों को छोड़कर मर्दों से कामेच्छा पूरी करते हो, वास्तव में तुम नितांत मर्यादाहीन लोग हो।’’ 
(क़ुरआन, 7:80-81)

‘‘वह अल्लाह ही है, जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया और उसी की जाति से उसका जोड़ा पैदा किया ताकि उसकी ओर प्रवृत होकर शान्ति और चैन प्राप्त करे।’’ (क़ुरआन, 7:189)
‘‘तुम तो वह अश्लील कर्म करते हो जो तुम से पहले दुनिया वालों में से किसी ने नहीं किया। तुम्हारा हाल यह है कि तुम मर्दों के पास जाते हो और बटमारी करते हो। (अर्थात् प्रकृति के मार्ग को छोड़ रहो हो।)’’ (क़ुरआन, 29:28-29)

‘‘और यह भी उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हारी ही सहजाति से तुम्हारे लिए जोड़े पैदा किए ताकि तुम उनके पास शान्ति प्राप्त करो और उसने तुम्हारे बीच प्रेम और दयालुता पैदा की। निश्चय ही इसमें बहुत-सी निशानियां हैं उन लोगों के लिए जो सोच-विचार करते हैं।’’ (क़ुरआन, 30:21) 


इसके अलावा अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने भी समलैंगिकता को एक अनैतिक और आपराधिक कार्य बताते हुए इससे बचने के आदेश दिये हैं। अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने कहा है कि—‘‘एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के गुप्तांग नहीं देखने चाहिए और एक महिला को दूसरी महिला के गुप्तांग नहीं देखने चाहिए । किसी व्यक्ति को बिना वस्त्र के दूसरे व्यक्ति के साथ एक चादर में नहीं लेटना चाहिए और इस प्रकार एक महिला को बिना वस्त्र के दूसरी महिला के साथ एक चादर में नहीं लेटना चाहिए ।’’ (अबू दाऊद)

अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) ने कहा कि उस पर अल्लाह की लानत हो जो वह काम करे जो हज़रत लूत (अलैहि॰) की क़ौम किया करती थी, अर्थात समलैंगिकता (हदीस: इब्ने हिब्बान) दूसरे स्थान पर आप (सल्ल॰) ने फ़रमाया—समलैंगिकता में लिप्त दोनों पक्षों को जान से मार दो। (तिरमिज़ी) यह आदेश सरकार के लिए है किसी व्यक्ति के लिए नहीं । इसके अलावा समलैंगिकता में लिप्त महिलाओं के बारे में अल्लाह के रसूल (सल्ल॰) का कथन है कि यह औरतों का ज़िना (बलात्कार) है । (तबरानी)

इस्लामी शरीअत में समलैंगिकता को एक ऐसा अपराध माना गया है, जिसकी सज़ा मौत है, यदि यह लिवात (दो पुरुषों के बीच समलिंगी संबंध) हो । सिहाक़ (दो महिलाओं के बीच समलिंगी संबंध) को चूंकि ज़िना (बलात्कार) माना गया है, इसलिए इसकी सज़ा वही है, जो ज़िना की है अर्थात इसमें लिप्त महिला यदि विवाहित है तो उसे मौत की सज़ा दी जाए और यदि अविवाहित है तो उसे कोड़े लगाए जाएं । ये सज़ाएं व्यक्ति के लिए हैं यानी व्यक्तिगत रूप से जब कोई इस अपराध में लिप्त पाया जाए, लेकिन यदि सम्पूर्ण समाज इस कुकृत्य में लिप्त हो तो उसकी सज़ा ख़ुद क़ुरआन ने निर्धारित कर दी है—
‘‘और लूत को हमने पैग़म्बर बनाकर भेजा, फिर याद करो जब उसने अपनी क़ौम से कहा क्या तुम ऐसे निर्लज्ज हो गये हो...तुम स्त्रियों को छोड़ कर पुरुषों से काम वासना पूरी करते हो । वास्तव में तुम नितांत मर्यादाहीन लोग हो । किन्तु उसकी क़ौम का उत्तर इसके सिवा कुछ नहीं था कि निकालो इन लोगों को अपनी बस्तियों से ये बड़े पवित्रचारी बनते हैं । अंततः हमने लूत और उसके घर वालों को (और उसके साथ ईमान लाने वालों को) सिवाय उसकी पत्नी के जो पीछे रह जाने वालों में थी, बचाकर निकाल दिया और उस क़ौम पर बरसायी (पत्थरों की) एक वर्षा। फिर देखो उन अपराधियों का क्या परिणाम हुआ ।’’ (क़ुरआन, 7:80-84)


हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) की क़ौम पर अज़ाब की इस घटना को क़ुरआन दो अन्य स्थानों पर इस शब्दों में प्रस्तुत करता है :
‘‘फिर जब हमारा आदेश आ पहुंचा तो हमने उसको (बस्ती को) तलपट कर दिया और उस पर कंकरीले पत्थर ताबड़-तोड़ बरसाए।’’ (क़ुरआन, 11:82)
‘‘अंततः पौ फटते-फटते एक भयंकर आवाज़ ने उन्हें आ लिया और हमने उस बस्ती को तलपट कर दिया और उस पर कंकरीले पत्थर बरसाए।’’ 
(क़ुरआन, 15:73-74)


समलैंगिकता एक नैतिक असंतुलन है, एक अपराध और दुराचार है । इसमें संदेह नहीं कि यह बुराई मानव समाज में सदियों से मौजूद है, वैसे ही जैसे, चोरी, झूठ, हत्या आदि दूसरे अपराध समाज में सदियों से मौजूद हैं । इनके उन्मूलन के प्रयास किये जाने चाहिएं न कि इन्हें सामाजिक स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए । कोई भी व्यक्ति जन्म से ही समलैंगिक नहीं होता है, जैसे कोई भी जन्म से चोर या हत्यारा नहीं होता, बल्कि लोग उचित मार्गदर्शन के अभाव में ये बुराइयां सीखते हैं । किशोरावस्था में अपनी नवीन और तीव्र कामेच्छा पर नियंत्रण न पाने के कारण ही लोग समलिंगी दुराचारों का शिकार हो जाते हैं ।

समलैंगिकता को एक जन्मजात शारीरिक दोष और मानसिक रोग भी बताया जाता है। जो लोग इसमें लिप्त हैं या इसे सही समझते हैं वे ये कुतर्क देते हैं कि हमें ईश्वर ने ऐसा ही बनाकर पैदा किया है अर्थात् यह हमारा स्वभाव है जिससे हम छुटकारा नहीं पा सकते हैं। लेकिन वे अपने विचार के पक्ष में कोई तर्क देने में असमर्थ हैं। दूसरी ओर इसका विरोध करने वाले लोगों का एक वर्ग इसे एक मानसिक रोग बताता है, लेकिन उसका यह सिद्धांत भी निराधार है, तर्कविहीन है। सच्चाई यह है कि समलैंगिकता सामान्य व्यक्तियों का असामान्य व्यवहार है और कुछ नहीं

क़ुरआन ने जिस प्रकार लूत की क़ौम की घटना प्रस्तुत की है उससे भी स्पष्ट होता है कि यह न तो शारीरिक दोष है और न मानसिक रोग, क्योंकि शारीरिक दोष या मानसिक रोग का एक-दो लोग शिकार हो सकते हैं, एक साथ सारी की सारी क़ौम नहीं। यह भी कि ईश्वर अपने दूत लोगों के शारीरिक या मानसिक रोगों के उपचार के लिए नहीं भेजता और न ही उपदेश या मार्गदर्शन देने या अपने अच्छे आचरण का व्यावहारिक नमूना प्रस्तुत करने से ऐसे रोग दूर हो सकते हैं। यह मात्र एक दुराचार है, जिस प्रकार नशे की लत, गाली-गलौज, और झगड़े-लड़ाई की प्रवृत्ति और अन्य दुराचार।

समलैंगिकता व्यक्ति और समाज दोनों के लिए ख़तरनाक है। यह एक घातक रोग (एड्स) का मुख्य कारण है। इसके अलावा यह महिला और पुरुष दोनों के लिए अपमानजनक भी है। इस्लाम एक पुरुष को पुरुष और एक महिला को महिला बने रहने की शिक्षा देता है, जबकि समलैंगिकता एक पुरुष से उसका पुरुषत्व और एक महिला से उसका स्त्रीत्व छीन लेता है। यह अत्यंत अस्वाभाविक जीवनशैली है। समलैंगिकता पारिवारिक जीवन को विघटन की ओर ले जाता है

इन्हीं कारणों से इस्लाम समलैंगिकता को एक अक्षम्य अपराध मानते हुए समाज में इसके लिए कोई स्थान नहीं छोड़ता है। और यदि समाज में यह अपना कोई स्थान बनाने लगे तो उसे रोकने के लिए या अगर कोई स्थान बना ले तो उसके उन्मूलन के लिए पूरी निष्ठा और गंभीरता के साथ आवश्यक और कड़े क़दम भी उठाता है।

चलते-चलते::: 
रास्ते में पड़ी कष्टदायक चीज़ें (कांटा, पत्थर, केले का छिलका आदि) हटा देना (ताकि राहगीरों को तकलीफ़ से बचाया जाए) इबादत है!

3 टिप्पणियाँ:

kirti ki awaz ने कहा…

ज्ञानवर्धक पोस्ट बधाई..

saty bolna paap hai ने कहा…

sundar soch ke aabhar, achchhi rachna.

हरीश सिंह ने कहा…

अच्छा आलेख....

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