शनिवार, 12 मार्च 2011

जो बस में नहीं इनके,उसकी सज़ा इनको ना दो




इंसान की औलाद है
सब जन्मे
वैसे ही जन्म लिया
इश्वर ने
इन्हें अधूरा रख दिया
समाज ने
सदा मज़ाक उड़ाया 
हमने इन्हें 
अपने से अलग समझा
सदा व्यवहार तिरस्कार
का करा
घर से दूर अपने जैसों के
साथ रहते
हर खुशी में घर पर आते
नाच गा कर नेक अपना लेते
जीवन अपना उसी से चलाते
 नवाब और राजा भी उन्हें
पालते
युद्ध के मैदान से
राज महल में सेवा देते
किन्नर या हिंजड़ा कहलाते
निरंतर
प्रार्थना परमात्मा से करता
अपनी संतान का तो
ख्याल करो
सम्मान और प्यार का
जीवन इन्हें दो
जो बस में नहीं इनके
उसकी सज़ा इनको ना दो
ना तिरस्कार कोई इनका करे
ना  कोई मज़ाक इनका उड़ाए
सदियाँ बीत गयी इनको सहते 
अब तो इन्हें नया मुकाम दो
आम आदमी का
नाम दे दो
12—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

3 टिप्पणियाँ:

कुणाल वर्मा ने कहा…

अतिसुन्दर रचना। आभार

kirti hegde ने कहा…

अतिसुन्दर रचना। आभार

हरीश सिंह ने कहा…

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