मंगलवार, 15 मार्च 2011

सब बचपन में पढी एक कहानी भूल गए



 
सब बचपन में
पढी एक कहानी
भूल गए
कछुए और खरगोश की
दौड़ भूल गए
कछुआ जीता था
किसी को याद ना रहा
खरगोश सा दौड़ना
दिमाग में रहा
इस लिए सब
तेजी से दौड़ रहे
 मंजिल तक पहुँचने को
बेताब हो रहे
कोई गिर रहा
कोई पड़ रहा
सांस किसी की
तेज़ चल रही
कोई सख्त बीमार,
पैर कब्र में लटक रहे
और पाने की दौड़ में
फिर भी भाग रहे 
खुद को भी भूल गए,
खुदा को भी नहीं
बख्शते 
याद करने का दस्तूर
निभाते
कहाँ दौड़ ख़त्म होगी
किसी को पता नहीं
मंजिल निरंतर दूर
होती जा रही
फिर भी सब दौड़ रहे,
निरंतर भूल रहे
जीत अंत में कछुए की
होती
सब्र की जीत सदा
होती
इच्छा की कोई सीमा
नहीं होती

15—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
  

2 टिप्पणियाँ:

हरीश सिंह ने कहा…

swagat.

Manpreet Kaur ने कहा…

वह वह वह बहुत ही सुंदर रचना है आपके दिल खुश हो गिया ! हवे अ गुड डे
मेरे ब्लॉग पर आए !
Music Bol
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Shayari Dil Se

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