रविवार, 6 मार्च 2011

पत्थर हूँ तो क्या हुआ,मुझ में भी दिल बसता

पत्थर हूँ
तो क्या हुआ
मुझ में भी दिल बसता
पहाड़ से ज़मीन तक
रहता
मज़ार से मंदिर तक काम
आता
घर सड़क में इस्तेमाल होता
इंसान का बुत मुझ से बनता 
इश्वर समझ पूजा जाता
आभूषण में सौन्दर्य बढाता
कभी नीलम कभी पुखराज
कहलाता
इतना कर के भी दुत्कारा
जाता
मूर्ख को अक्ल में पत्थर
कह कर
निष्ठुर दिल को पत्थर दिल
कह कर
निरंतर मज़ाक बनाया जाता
मुझ से ज्यादा इंसान निष्ठुर
हथोड़े निरंतर चलाता मुझ पर
फिर भी कुछ नहीं कहता 
हर चोट को चुपचाप सहता  
निरंतर काम इंसान के आता 
एक प्रार्थना मैं भी कर लूं
थोड़ा सम्मान मुझे भी दे दो
भावनाओं का ख्याल कर लो
मुहावरों से मेरा नाम
हटा दो
06—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर

3 टिप्पणियाँ:

saurabh dubey ने कहा…

पत्थर में भी एक दील होता हें पर इसे अनुभव करने के लिये एक दिल चाहिए

हरीश सिंह ने कहा…

तभी तो कहते है जनाब, दिल पत्थर हो गया, दिल पत्थर ही है क्योंकि टूट जाता है.
--

saty bolna paap hai ने कहा…

पत्थरों को भी दिल क्या परिकल्पना है.

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