मंगलवार, 22 मार्च 2011

बचपन...





गुमसुम -गुमसुम, खोया खोया
आसमान को तकता बचपन !
चिड़ियों के पंखों में
पशुओं की दौड़ों में 
खुद को तलाशता बचपन !
दूर कहीं झंकृत संगीत 
थापों की थप- थप
रुनझुन- रुनझुन घुंघरू की
खुद ही तरसता बचपन !
घर के आँगन में,
भीड़ में, एकांत में,
कण- कण से कण-कण में
माँ को ढूंढ़ता बचपन !
एहसासों में कृन्दन 
अश्रु नेत्रपटल की 
ओट में,
जीवन के आयामों से
लोगों से, दीवारों से 
खुद को बहलाता बचपन !
दूर कहीं --
गुमसुम-गुमसुम खोया-खोया 
आसमान को तकता बचपन !!


प्रियंका राठौर  

6 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत संवेदनशील रचना ..होता है ऐसा भी बचपन

हरीश सिंह ने कहा…

कविता पढ़कर बचपन की यादों में खो गया, स्वागतम

Atul Shrivastava ने कहा…

सच में बचपन की यादें ताजा हो गईं।

तीसरी आंख ने कहा…

बहुत सुंदर

Mr Dutt ने कहा…

aap ki rachna padh kar aankhon se aansu aa gye padh kar aisa lga kya aisa hi hota hai bachhapn
hansa

PRIYANKA RATHORE ने कहा…

aap sabhi ka bahut bahut dhanybad...

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