गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

jo kiya sahi kiya.

एक प्रसिद्ध शायर का शेर है-
"हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती."
       शायद प्रधान मंत्री जी यही कह रहे हैं आजकल.क्योंकि चारों और से उनकी घेराबंदी  जो की जा रही है किन्तु जो आज सुबह के अमरउजाला में उनका बयान पढ़ा

जिसमे उन्होंने कहा "कि जितना दोषी नहीं उससे ज्यादा दिखाया जा रहा हूँ,इस्तीफ़ा नहीं दूंगा."
बयान पसंद आया.आप सोच सकते हैं कि मैं शायद चापलूसी की राह पर चल रही हूँ सोचिये सोचने से कौन रोकता है किन्तु यदि हम ध्यान से सोचे तो हमें उनकी ये बात कि गठबंधन धर्म के कारण मजबूरी की बात में कोई झूठ नजर नहीं आएगा.आप खुद सोचिये पहले संयुक्त परिवार की प्रथा थी और उसमे करने वाला एक होता था और खाने वाले सौ.उस का ही ये नतीजा है कि आज यह प्रथा टूट चुकी है.राजनीति में ये प्रथा अभी अभी आरंभ हुई है और इसके खामियाजे अभी से ही नजर आने लगे हैं.गलत हो या सही परिवार को बनाये रखना परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी हो जाती है और प्रधानमंत्री जी वही कर रहे हैं.
     अब एक बात और ,प्रधानमंत्री जी पर सारी जिम्मेदारी डाल कर हम अपनी जिम्मेदारी से मुहं   नहीं मोड़ सकते.हमारे संविधान ने हमें वोट का अधिकार दिया और हम अपने इस अधिकार का क्या इस्तेमाल करते हैं?कुछ नहीं .कहने को शिक्षित वर्ग अपने अधिकारों का अच्छी तरह इस्तेमाल कर सकता है किन्तु ये शिक्षित वर्ग ही है जो वोट के समय अपने वक़्त को कथित रूप से वोट डालने में बर्बाद नहीं करता.अपनी जरूरी मीटिंग्स करता है.घर बैठता है और अपने जितने काम "पेंदिंग्स -सूची "में होते हैं पूरे करता है और जो वर्ग कुछ नहीं जानता सिर्फ दो वक़्त की रोटी के, शराब की चसक के,भूख प्यास के वह वोट डालने जाता है और अपनी वोट बेच कर आ जाता है.मनमोहन सिंह जी जैसे काबिल नेता चुने नहीं जाते और चम्बल छोड़ नेता बने उम्मीदवार चुन लिए जाते हैं और सदन में बैठ देश का सर झुकाते हैं.मनमोहन जी जैसे नेता को राज्य सभा के जरिये सत्ता में शामिल किया जाता है और उस पर भी हम सच्चाई का साथ न दे हर समय उनकी आलोचना ढूंढते रहते हैं.और किसी को सही लगा हो या न हो पर मुझे बहुत अच्छा लगा है कि इस तरह की बातों से प्रधान मंत्री जी घबराये नहीं और इस्तीफा देने से मुकर गए.वैसे  भी जो व्यक्ति देश की बागडोर सँभालते हैं उन्हें ऐसी छोटी-मोटी परेशानियों से घबराना भी नहीं चाहिए क्योंकि उनकी नजर देश के लिए  ज्यादा करने की ओर रहती है.जैसी कि "अनवर हुसैन"कहते हैं-
"मौसमों की खबर नहीं रखता,
वो परिंदा जो पर नहीं रखता,
देखता हूँ मैं मंजिलों को ,
फासलों पर नजर नहीं रखता."
[http ://shalinikaushik2 .blogspot .com }
       

2 टिप्पणियाँ:

हरीश सिंह ने कहा…

"हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती."
अच्छी पोस्ट, अब मनमोहन सिंह को दोष क्यों दिया जाय वह तो वही बोलेंगे न जो कहा जायेगा.

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Praveen Dubey ने कहा…

bhot achhe

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